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झारखंड भर्ती संकट

झारखंड के युवाओं के साथ न्याय का समय: क्या एकीकृत भर्ती परीक्षा (Unified Recruitment Examination) समाधान बन सकती है?

प्रस्तावना

झारखंड आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ हजारों शिक्षित युवा वर्षों से रोजगार की प्रतीक्षा में हैं। राज्य में सरकारी पदों की भरमार खाली पड़ी है, फिर भी नियुक्तियाँ रुकी हुई हैं। दूसरी ओर, झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) और झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) द्वारा आयोजित परीक्षाओं में बार-बार सामने आती अनियमितताओं, पेपर लीक और पारदर्शिता पर उठते सवालों ने युवाओं के धैर्य और विश्वास, दोनों को गहरी चोट पहुँचाई है।

यह केवल रोजगार की समस्या नहीं है। यह न्याय, सुशासन और लोकतांत्रिक विश्वास की परीक्षा है — और इस परीक्षा में राज्य को साबित करना है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिक के साथ भी खड़ा रह सकता है।

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आँकड़ों की तस्वीर

राज्य के वित्तीय दस्तावेजों पर नजर डालें तो समस्या की गंभीरता और स्पष्ट हो जाती है। झारखंड के विभिन्न विभागों में कुल स्वीकृत 3,51,968 पदों में से केवल 1,87,610 पदों पर ही कर्मचारी कार्यरत हैं — यानी करीब 1,64,358 पद, कुल स्वीकृत संख्या के लगभग 46 प्रतिशत, अब भी रिक्त पड़े हैं।

सबसे अधिक असर उन्हीं विभागों में दिख रहा है जिनका सीधा नाता आम नागरिक के रोजमर्रा जीवन से है —

  • शिक्षा विभाग: 1,10,079 स्वीकृत पदों में से 52,090 पद रिक्त — यानी हर दूसरा पद खाली।
  • गृह विभाग: 1,04,286 स्वीकृत पदों में से 30,985 पद रिक्त।
  • स्वास्थ्य विभाग: 35,980 स्वीकृत पदों में से मुश्किल से 9,856 पदों पर ही स्टाफ कार्यरत।
  • राजस्व विभाग: 10,819 स्वीकृत पदों में से 4,500 पद रिक्त।

इन आंकड़ों के पीछे की कहानी सीधी है — जहाँ शिक्षक नहीं, वहाँ बच्चे पढ़ाई से वंचित रह जाते हैं; जहाँ स्वास्थ्यकर्मी नहीं, वहाँ इलाज की पहुँच सीमित हो जाती है; जहाँ राजस्व कर्मी नहीं, वहाँ जमीन के मामले वर्षों तक दफ्तरों में अटके रहते हैं। कृषि, सिंचाई, ग्रामीण विकास, पंचायती राज, पथ निर्माण और खाद्य आपूर्ति जैसे कई अन्य विभागों में भी बड़ी संख्या में पद खाली हैं, जिससे योजनाओं के क्रियान्वयन की गति पर सीधा असर पड़ रहा है।

दूसरी ओर, हाल के महीनों में जेपीएससी की सिविल सेवा मुख्य परीक्षा सहित कई प्रतियोगी परीक्षाएँ अनियमितताओं और विवादों के चलते अगले आदेश तक स्थगित करनी पड़ी हैं। यानी एक तरफ लाखों पद खाली हैं, दूसरी तरफ जो परीक्षाएँ चल भी रही हैं, वे भरोसे के संकट से जूझ रही हैं। यही विरोधाभास इस समस्या को और अधिक गंभीर बनाता है।

समस्या केवल बेरोजगारी नहीं है

जब सरकारी पद वर्षों तक खाली रहते हैं, तो उसका असर केवल परीक्षार्थियों तक सीमित नहीं रहता। इसके चार गंभीर परिणाम एक साथ सामने आते हैं, और चारों एक-दूसरे को गहरा करते जाते हैं।

पहला — युवाओं के साथ अन्याय

लाखों युवा वर्षों तक तैयारी में लगे रहते हैं। इस बीच उनकी उम्र निकलती जाती है, परिवार की जमा-पूँजी खर्च होती जाती है, और मानसिक दबाव बढ़ता जाता है। यह केवल एक नौकरी के अवसर का खोना नहीं है — यह जीवन के सबसे उर्वर वर्षों का, जो कभी लौटकर नहीं आते, नुकसान है। यह अन्याय अकेले उस युवा तक सीमित नहीं रहता; इसकी छाया पूरे परिवार पर पड़ती है।

दूसरा — जनता के अधिकारों का हनन

सरकारी पद खाली रहने का सीधा अर्थ है —

  • विद्यालयों में शिक्षक नहीं,
  • अस्पतालों में डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी नहीं,
  • कार्यालयों में पर्याप्त कर्मचारी नहीं,
  • योजनाओं का क्रियान्वयन समय पर नहीं।

इसका सबसे सीधा नुकसान उस आम नागरिक को होता है, जिसे इन सेवाओं की सबसे अधिक आवश्यकता है। लोकतंत्र में सार्वजनिक सेवा नागरिक का अधिकार है, राज्य का उपकार नहीं — और जब यह अधिकार वर्षों तक अधूरा रहता है, तो यह प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि संवैधानिक वादे का उल्लंघन बन जाता है।

तीसरा — लोकतंत्र पर विश्वास कमजोर होना

सबसे अधिक चोट उन परिवारों को पहुँचती है जिनके बच्चे परिवार में पहली पीढ़ी के शिक्षित (फर्स्ट जेनरेशन लर्नर) हैं। ऐसे परिवारों ने शिक्षा को सामाजिक बदलाव का सबसे भरोसेमंद रास्ता माना था। जब इन्हीं परिवारों के बच्चों को बार-बार यह अनुभव होता है कि मेहनत और प्रतिभा से अधिक व्यवस्था और साधन मायने रखते हैं, तो उनका भरोसा केवल परीक्षा प्रणाली से नहीं, बल्कि पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था से डगमगाने लगता है। यह किसी भी लोकतंत्र के लिए एक गंभीर और समय रहते सुनी जाने वाली चेतावनी है।

चौथा — झारखंड का डेमोग्राफिक डिविडेंड गंवाना

झारखंड आज उस दौर से गुजर रहा है, जब राज्य की आबादी का बड़ा हिस्सा कामकाजी उम्र का है। जनसंख्या-विज्ञान की भाषा में इसे जनसांख्यिकीय लाभांश (डेमोग्राफिक डिविडेंड) कहा जाता है — यह वह खिड़की है जो किसी भी समाज के इतिहास में एक बार खुलती है, और यदि समय रहते इसका उपयोग न हो, तो वह हमेशा के लिए बंद हो जाती है।

लेकिन यह लाभांश अपने आप नहीं मिलता। इसके लिए जरूरी है कि इतनी बड़ी युवा आबादी को समय पर, पारदर्शी और भरोसेमंद तरीके से रोजगार और अवसर मिले। जब लाखों पद वर्षों तक खाली रहते हैं, जब परीक्षाएँ बार-बार विवादों में उलझकर स्थगित होती रहती हैं, और जब सबसे मेधावी युवा अपनी सबसे उत्पादक उम्र तैयारी में गँवाकर भी नियुक्ति से वंचित रह जाते हैं — तो यही जनसांख्यिकीय लाभांश धीरे-धीरे जनसांख्यिकीय बोझ में बदलने लगता है।

यह नुकसान किसी एक परिवार या किसी एक जिले तक सीमित नहीं है — यह पूरे राज्य के आर्थिक भविष्य का नुकसान है। जो ऊर्जा, कौशल और समय आज उत्पादक रोजगार में लगना चाहिए था, वह अनिश्चितता, प्रतीक्षा और बार-बार की तैयारी में खर्च हो रहा है। यह अवसर की खिड़की सीमित समय के लिए ही खुली रहती है, और हर साल की देरी इस दुर्लभ अवसर को स्थायी रूप से छोटा करती जा रही है।

वर्तमान व्यवस्था की व्यावहारिक कठिनाइयाँ

आज हर विभाग अपनी भर्ती स्वतंत्र रूप से, अलग समय पर, अलग प्रक्रिया से निकालता है। एक अकेले शिक्षक पद के लिए भी परीक्षा चार अलग-अलग पेपरों में बँटी होती है, और हर पेपर के लिए —

  • अलग आवेदन,
  • अलग शुल्क,
  • अलग एडमिट कार्ड,
  • अलग परीक्षा केंद्र,
  • अलग तिथि और अलग परिणाम।

यह बिखराव संयोग नहीं है। जो लोग परीक्षा प्रणाली को कमजोर करना चाहते हैं, वे यही चाहते हैं कि जेन्युइन, मेहनती और प्रतिभावान विद्यार्थी किसी न किसी पेपर में अनुपस्थित रह जाएँ या बाहर हो जाएँ — जिससे मेरिट का दायरा सिकुड़ता जाए।

सबसे अधिक कठिनाई किसे होती है?

झारखंड का भूगोल जितना विविध है, अंतिम पंक्ति में खड़े परीक्षार्थी की चुनौती भी उतनी ही व्यापक है — यह किसी एक जिले या इलाके तक सीमित नहीं है।

गढ़वा — पलामू प्रमंडल के एक दूरस्थ छोर पर बसा जिला — के किसी सुदूर गाँव की एक छात्रा की कल्पना कीजिए। वह अपने परिवार की पहली पीढ़ी है जो पढ़ाई कर रही है। उसके माता-पिता दिहाड़ी मजदूर हैं। अब यदि उसकी शिक्षक भर्ती परीक्षा चार पेपरों में बँटी हो, और हर पेपर के लिए उसे एक नया शहर तय करना पड़े — पहला पेपर धनबाद में, दूसरा देवघर में, तीसरा जमशेदपुर में, चौथा रांची में — तो क्या यह वास्तव में समान अवसर (इक्वल अपॉर्च्युनिटी) है?

यही कठिनाई राज्य के दूसरे छोर पर भी उतनी ही सच है। संथाल परगना प्रमंडल के पाकुड़ या साहिबगंज जैसे सुदूर जिलों का कोई युवा, या कोल्हान प्रमंडल के सिंहभूम अंचल — पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला-खरसावाँ के आदिवासी बहुल गाँवों की कोई छात्रा — इन सबकी भौगोलिक दिशा भले अलग हो, पर परिस्थिति एक जैसी है: गाँव से प्रखंड और प्रखंड से परीक्षा-शहर तक पहुँचने में लगने वाला लंबा समय, सीमित और अनियमित सार्वजनिक परिवहन, और परिवार की उतनी ही सीमित आर्थिक क्षमता। पलामू का पठारी सूखा इलाका हो, संथाल परगना की पहाड़ी-नदी घाटियाँ हों, या कोल्हान का घना वन क्षेत्र — तीनों जगह दूरी और साधनहीनता एक ही तरह से अभ्यर्थी के रास्ते में खड़ी होती है।

यात्रा का खर्च, ठहरने की व्यवस्था, सुरक्षा की चिंता — विशेषकर बेटियों के लिए — सार्वजनिक परिवहन की सीमाएँ, और परिवार की सीमित आर्थिक क्षमता, इन सबको जोड़ दें तो साफ दिखता है: चाहे गढ़वा हो, पाकुड़-साहिबगंज हो या सिंहभूम, बहुत-सी प्रतिभाशाली छात्राएँ और छात्र परीक्षा कक्ष तक पहुँचने से पहले ही दौड़ से बाहर हो जाते हैं। यह उनकी प्रतिभा की हार नहीं है — यह परिस्थितियों की हार है, और परिस्थितियों की यह हार व्यवस्था की बनाई हुई है, जो झारखंड के हर कोने में एक जैसी दिखती है।

यह किसी व्यक्ति या दल का दोष नहीं — जड़ व्यवस्था में है

यहाँ यह स्पष्ट करना जरूरी है — यह बात किसी एक राजनीतिक दल, किसी एक नेता या किसी एक अधिकारी को दोषी ठहराने के लिए नहीं कही जा रही। समस्या इससे कहीं गहरी और पुरानी है। यह हमारी राजनीतिक-प्रशासनिक व्यवस्था के केंद्र में बैठी उस संरचना का परिणाम है, जिसमें असमानता, असुरक्षा-अन्याय, अहंकार और भ्रष्टाचार एक साथ गुंथे हुए हैं। इसी संरचना ने पूरे समाज को दो हिस्सों में बाँट दिया है — आम अवाम और खास।

यह बँटवारा जाति या धर्म पर आधारित नहीं है; यह पूरी तरह परिस्थितिजन्य है। खास वर्ग में भी अधिकांश लोग नैतिक, मेहनती और ईमानदार हैं। समस्या खास वर्ग के उन गिने-चुने लोगों से है, जो अपने पद, प्रभाव और साधन का दुरुपयोग करते हैं। ऐसे लोगों को इस बात की परवाह नहीं होती कि उनका बच्चा वाकई योग्य है या नहीं — उन्हें केवल यह चाहिए कि बच्चा किसी तरह व्यवस्था में ‘सेट’ हो जाए। इसके लिए वे अपने पास जमा काली कमाई का इस्तेमाल करते हैं।

यहीं से एक खतरनाक चक्र शुरू होता है — काली कमाई से नौकरी मिलती है, नौकरी और उसके प्रभाव से राजनीति में पकड़ बनती है, और वह राजनीतिक पकड़ फिर काली कमाई कमाने और बचाने का जरिया बन जाती है। काली कमाई, नौकरी और राजनीति — ये तीनों एक-दूसरे को सहारा देते हुए एक ही चक्र में घूमते रहते हैं। इस तरह जो सरकारी नौकरी नागरिक-सेवा का माध्यम होनी चाहिए, वह इन गिने-चुने लोगों के हाथों में एक तरह का व्यापार बनकर रह गई है, और यही व्यापार आगे चलकर राजनीतिक सत्ता को भी सींचता रहता है।

इसकी जड़ में एक और गहरी समस्या है। हमारी व्यवस्था आज भी नागरिक के साथ नागरिक जैसा नहीं, प्रजा जैसा व्यवहार करती है। न कोई जिम्मेदारी मानने को तैयार है, न कोई जवाबदेही। जिनके भीतर पकड़े जाने या जवाब देने का भय ही नहीं है, वे मनमानी करते ही रहेंगे — और यही मनमानी झारखंड के गठन के दिन से आज तक, किसी न किसी रूप में, बार-बार दोहराई गई है।

क्या समाधान हो सकता है?

असाधारण परिस्थितियों का समाधान सामान्य, घिसी-पिटी प्रक्रियाओं से नहीं निकलता। जब पूरे भर्ती तंत्र की निष्पक्षता पर ही सवाल उठ चुके हों — जब अलग-अलग विभाग, अलग-अलग स्तर, अलग-अलग जिलों में बनी अलग-अलग संस्थाएँ, सब पर संदेह की छाया हो — तब पुराने ढर्रे पर परीक्षाएँ चलाते रहना समाधान नहीं, समस्या को टालना भर है। यह समय पारंपरिक सोच से हटकर, लेटरल थिंकिंग (Lateral Thinking) अपनाने का है।

एकीकृत भर्ती परीक्षा (Unified Recruitment Examination)

राज्य सरकार निम्नलिखित कदमों पर गंभीरता से विचार कर सकती है —

  • सभी विभागों की स्वीकृत रिक्तियों का एक साथ समेकन।
  • एक ही व्यापक भर्ती विज्ञापन।
  • सभी पदों के लिए एक साझा, समान प्रारंभिक परीक्षा।
  • मेरिट सूची का पारदर्शी और समयबद्ध प्रकाशन।
  • संबंधित सेवाओं के अनुसार आगे की चयन प्रक्रिया।
  • पूरी परीक्षा-प्रक्रिया — प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर परिणाम तक — का दायित्व एक ही स्वतंत्र, सक्षम और उत्तरदायी आयोग, अर्थात् जेपीएससी, को सौंपना।

इससे पारदर्शिता बढ़ेगी, प्रशासनिक लागत घटेगी, समय की बचत होगी, अभ्यर्थियों पर आर्थिक बोझ कम होगा, और सबसे महत्वपूर्ण — पूरी प्रक्रिया एक ही निगरानी-योग्य ढाँचे के भीतर आ जाएगी।

आउटसोर्सिंग पर पुनर्विचार जरूरी

जेपीएससी सहित लगभग सभी हाल की परीक्षाओं में जो अनियमितताएँ सामने आई हैं, उनकी जड़ में बार-बार एक ही कड़ी की ओर इशारा किया जा रहा है — परीक्षा-संचालन का काम निजी आउटसोर्सिंग कंपनियों को सौंपा जाना। जब प्रश्नपत्र निर्माण, मुद्रण, वितरण या मूल्यांकन जैसा संवेदनशील दायित्व बाहरी एजेंसियों के हाथ में चला जाता है, तो जवाबदेही की कड़ी टूट जाती है — गड़बड़ी होने पर न सरकार सीधे जिम्मेदार ठहराई जा सकती है, न वह एजेंसी जिसका दायित्व सीमित अनुबंध तक ही होता है।

इसलिए दो कदम एक साथ जरूरी हैं: परीक्षा-पूर्व से लेकर परिणाम तक का पूरा मैंडेट जेपीएससी जैसी संवैधानिक संस्था को सौंपा जाए, और परीक्षा-संचालन में निजी आउटसोर्सिंग को पूरी तरह समाप्त किया जाए। जहाँ भी बार-बार अनियमितता के आरोप लगे हों, वहाँ स्वतंत्र समीक्षा भी अनिवार्य है।

भर्ती परीक्षा लोकतंत्र का सबसे संवेदनशील प्रशासनिक कार्य है, क्योंकि यह सीधे नागरिक के भविष्य से जुड़ती है। जब अभ्यर्थियों का भरोसा कमजोर पड़ता है, तो सवालों के घेरे में केवल वह एक परीक्षा नहीं आती — पूरी व्यवस्था आती है। इसलिए परीक्षा-संचालन की हर कड़ी पारदर्शी, उत्तरदायी, तकनीकी रूप से सुरक्षित और सार्वजनिक निगरानी के योग्य होनी चाहिए।

अंतिम व्यक्ति को केंद्र में रखकर नीति बनानी होगी

“जब भी तुम्हें संदेह हो… तो यह कसौटी अपनाओ: जो सबसे गरीब और सबसे कमजोर व्यक्ति तुमने देखा है, उसका चेहरा याद करो, और अपने आप से पूछो कि जो कदम तुम उठाने जा रहे हो, उससे उसे कोई लाभ होगा भी या नहीं।” — गांधी जी का प्रसिद्ध तालिस्मान (Talisman), भावार्थ

झारखंड में भर्ती व्यवस्था का मूल्यांकन भी इसी कसौटी पर होना चाहिए। यदि गढ़वा के किसी दूरस्थ गाँव की गरीब छात्रा परीक्षा-कक्ष तक पहुँच ही नहीं पा रही, तो सवाल परीक्षा के स्तर या पाठ्यक्रम का नहीं रह जाता — सवाल यह बन जाता है कि क्या हमारी व्यवस्था वाकई समान अवसर देती है, या केवल कागज़ पर देने का दावा करती है।

मुख्यमंत्री से एक सकारात्मक अपील

लोकतंत्र में नागरिक और राज्य के बीच की सबसे मजबूत कड़ी उसकी संस्थाएँ होती हैं। राज्य अंततः इन्हीं संस्थाओं के माध्यम से नागरिक तक पहुँचता है — इसलिए संस्थाओं में भरोसा और जवाबदेही के बिना लोकतंत्र केवल कागज़ पर लोकतंत्र बनकर रह जाता है।

इतिहास यह भी बता चुका है कि अकेले कानून और संशोधन इस समस्या का समाधान नहीं हैं। समय-समय पर एक से एक सख्त कानून बनाए गए, संशोधन किए गए — लेकिन जब तक व्यवस्था के भीतर जवाबदेही और भय की कमी बनी रहेगी, तब तक कोई कानून अकेले असर नहीं दिखा पाएगा। इसलिए अब जरूरत केवल एक और नए कानून की नहीं, बल्कि लेटरल थिंकिंग की है — जैसा कि एकीकृत भर्ती परीक्षा का यह प्रस्ताव है।

यह किसी सरकार या संस्था के विरुद्ध आंदोलन का मसला नहीं है। यह झारखंड के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है, जिसका समाधान सरकार, आयोग और युवाओं के साझा प्रयास से ही निकलेगा। आज आवश्यकता है —

  • शीघ्र भर्ती,
  • पारदर्शी भर्ती,
  • समयबद्ध भर्ती,
  • एकीकृत भर्ती,
  • और सबसे बढ़कर — न्यायपूर्ण भर्ती।

झारखंड के लाखों युवाओं को केवल नौकरी नहीं चाहिए; उन्हें यह भरोसा चाहिए कि उनकी मेहनत का सम्मान होगा, कि परीक्षा-कक्ष तक पहुँचने की उनकी लड़ाई परीक्षा से भी कठिन नहीं बनाई जाएगी। यदि यह भरोसा एक बार स्थापित हो गया, तो यह झारखंड की सबसे बड़ी प्रशासनिक और लोकतांत्रिक उपलब्धियों में गिना जाएगा।

निष्कर्ष

रिक्त पद केवल प्रशासनिक आँकड़े नहीं होते — वे नागरिकों के अधूरे अधिकार होते हैं। और बेरोजगार युवा केवल परीक्षार्थी नहीं होते — वे राज्य की सबसे बड़ी मानवीय पूँजी होते हैं, जिसका सदुपयोग या अपव्यय झारखंड के आने वाले दशकों की दिशा तय करेगा।

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