thumbnail 4

आदिवासी विश्व दिवस

विश्व आदिवासी दिवस: संस्कृति के उत्सव से आगे अधिकार, अस्मिता और न्यायपूर्ण विकास का प्रश्न

हर वर्ष 9 अगस्त को दुनिया भर में विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है। यह दिन आदिवासी एवं मूलनिवासी समुदायों की विशिष्ट पहचान, भाषाओं, संस्कृति, परंपराओं, सामुदायिक जीवन-पद्धतियों और प्रकृति के साथ उनके गहरे संबंध को सम्मान देने का अवसर है।

लेकिन इस दिवस का अर्थ केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम, पारंपरिक नृत्य, वेशभूषा और शुभकामना संदेशों तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य दुनिया का ध्यान उन ऐतिहासिक अन्यायों, वर्तमान चुनौतियों और अधिकारों के प्रश्नों की ओर आकर्षित करना है, जिनका सामना आदिवासी एवं मूलनिवासी समुदाय लंबे समय से करते आए हैं।

झारखंड जैसे राज्य के लिए विश्व आदिवासी दिवस का महत्व और भी अधिक है। झारखंड की ऐतिहासिक चेतना, सामाजिक पहचान, सांस्कृतिक विविधता और अलग राज्य के निर्माण का आंदोलन आदिवासी समाज के संघर्षों से गहराई से जुड़ा हुआ है।

9 अगस्त को ही विश्व आदिवासी दिवस क्यों मनाया जाता है?

9 अगस्त 1982 को संयुक्त राष्ट्र के Working Group on Indigenous Populations की पहली बैठक हुई थी। इस ऐतिहासिक घटना की स्मृति में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 1994 में निर्णय लिया कि प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को विश्व के मूलनिवासी लोगों के अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाएगा।

इस दिवस का उद्देश्य मूलनिवासी समुदायों के अधिकारों, गरिमा, संस्कृति, भाषा, भूमि, प्राकृतिक संसाधनों और स्वशासन से जुड़े विषयों के प्रति वैश्विक जागरूकता उत्पन्न करना है। इसके साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, मानवाधिकार और सामाजिक-आर्थिक विकास में इन समुदायों के योगदान और उनके सामने उपस्थित चुनौतियों को दुनिया के सामने लाना भी इसका उद्देश्य है।

इस प्रकार, विश्व आदिवासी दिवस किसी एक देश या क्षेत्र का उत्सव नहीं है। यह दुनिया भर के मूलनिवासी समुदायों के सम्मान, अधिकार और न्याय से जुड़ा अंतरराष्ट्रीय अवसर है।

इस दिवस की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?

दुनिया के आदिवासी एवं मूलनिवासी समुदायों ने अपनी विशिष्ट जीवन-पद्धतियों, भाषाओं, ज्ञान-परंपराओं और सामाजिक व्यवस्थाओं को सदियों से संरक्षित रखा है। प्रकृति, जंगल, नदियों, पहाड़ों और भूमि के साथ उनका संबंध केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक भी है।

इसके बावजूद दुनिया के अनेक हिस्सों में इन समुदायों को अपनी ही जमीन से विस्थापन, प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकारों के हनन, सांस्कृतिक उपेक्षा, भाषाओं के लुप्त होने, सामाजिक भेदभाव, गरीबी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी का सामना करना पड़ा।

अनेक विकास परियोजनाएँ ऐसी भूमि पर स्थापित की गईं, जहाँ आदिवासी समुदाय पीढ़ियों से रहते आए थे। खनन, बाँध, उद्योग, वन संबंधी प्रतिबंध और अन्य परियोजनाओं के कारण लोगों की जमीन, आजीविका और सामाजिक-सांस्कृतिक संबंध प्रभावित हुए। कई मामलों में समुदायों की वास्तविक भागीदारी और सहमति के बिना उनके भविष्य से जुड़े निर्णय लिए गए।

इसीलिए एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय दिवस की आवश्यकता महसूस हुई, जो दुनिया को यह याद दिलाए कि आदिवासी समुदाय केवल सहायता या कल्याण योजनाओं के लाभार्थी नहीं हैं। वे अधिकार-संपन्न नागरिक, विशिष्ट संस्कृतियों के संवाहक और अपने जीवन तथा संसाधनों से जुड़े निर्णयों के वैधानिक भागीदार हैं।

झारखंड के लिए इसका विशेष महत्व

झारखंड का अर्थ ही जंगलों की भूमि से जुड़ा हुआ है। यह प्रदेश संथाल, मुंडा, उरांव, हो, खड़िया, भूमिज, पहाड़िया, असुर, बिरहोर तथा अनेक अन्य आदिवासी समुदायों का ऐतिहासिक निवास-क्षेत्र रहा है। इन समुदायों की भाषाओं, लोकपरंपराओं, सामुदायिक व्यवस्थाओं, पर्वों और प्रकृति-सम्मत जीवन-दृष्टि ने झारखंड की विशिष्ट पहचान निर्मित की है।

झारखंड सरकार के आधिकारिक पोर्टल के अनुसार राज्य में 32 जनजातियाँ हैं। जनगणना 2011 के अनुसार अनुसूचित जनजाति समुदाय राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 26.2 प्रतिशत हैं। कई जिलों और क्षेत्रों में आदिवासी समुदाय स्थानीय समाज और संस्कृति के केंद्रीय आधार हैं।

झारखंड के इतिहास को आदिवासी संघर्षों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। तिलका मांझी, सिदो-कान्हू, चांद-भैरव, फूलो-झानो, भगवान बिरसा मुंडा, नीलांबर-पीतांबर, जतरा टाना भगत और अनेक ज्ञात-अज्ञात जननायकों ने अन्याय, शोषण, जमीन की बेदखली और बाहरी नियंत्रण के विरुद्ध संघर्ष किया।

इन आंदोलनों का आधार केवल आर्थिक असंतोष नहीं था। ये जल, जंगल, जमीन, स्वशासन, सामाजिक सम्मान और अपनी विशिष्ट पहचान की रक्षा के आंदोलन थे। अलग झारखंड राज्य का निर्माण भी इसी दीर्घ ऐतिहासिक चेतना और जनसंघर्ष से जुड़ा हुआ है।

इसलिए झारखंड में विश्व आदिवासी दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं होना चाहिए। इसे इस प्रश्न की गंभीर समीक्षा का अवसर बनना चाहिए कि अलग राज्य बनने के बाद आदिवासी समाज की आकांक्षाएँ कितनी पूरी हुईं।

संस्कृति का सम्मान पर्याप्त नहींअधिकार भी आवश्यक हैं

आदिवासी संस्कृति का सम्मान करना आवश्यक है। लेकिन संस्कृति को केवल नृत्य, गीत, वाद्ययंत्र, वेशभूषा और पर्वों तक सीमित कर देना उसके वास्तविक स्वरूप को छोटा कर देता है।

किसी संस्कृति का अस्तित्व उसकी भाषा, भूमि, आजीविका, सामाजिक संबंधों और सामुदायिक संस्थाओं से जुड़ा होता है। यदि कोई समुदाय अपनी जमीन, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों से अलग हो जाता है, यदि उसकी भाषा शिक्षा और प्रशासन से बाहर हो जाती है और यदि उसके भविष्य से जुड़े निर्णयों में उसकी भागीदारी नहीं रहती, तो केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम उस संस्कृति को जीवित नहीं रख सकते।

अतः संस्कृति के सम्मान के साथ निम्नलिखित अधिकारों की रक्षा भी आवश्यक है—

  • जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर वैधानिक तथा पारंपरिक अधिकार;
  • ग्रामसभा और स्थानीय स्वशासन की वास्तविक शक्ति;
  • मातृभाषा में प्रारंभिक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा;
  • खनन तथा विकास परियोजनाओं से पहले समुदाय की प्रभावी भागीदारी;
  • विस्थापित परिवारों का न्यायपूर्ण पुनर्वास और स्थायी आजीविका;
  • वनाधिकार और पेसा जैसे कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन;
  • शासन, प्रशासन और नीति-निर्माण में उचित प्रतिनिधित्व;
  • आदिवासी युवाओं और महिलाओं के लिए शिक्षा, कौशल तथा नेतृत्व के अवसर।

जल, जंगल और जमीन: संसाधन से अधिक जीवन का आधार

सामान्य आर्थिक दृष्टि में जमीन, जंगल, पानी और खनिजों को संसाधन माना जाता है। लेकिन आदिवासी जीवन-दृष्टि में इनका महत्व केवल आर्थिक नहीं है।

जमीन जीविका के साथ पूर्वजों, इतिहास और समुदाय से संबंध का आधार है। जंगल भोजन, औषधि, ईंधन और रोजगार देने के साथ सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक जीवन का भी हिस्सा है। नदी और जल-स्रोत केवल पानी उपलब्ध नहीं कराते; वे पूरे सामाजिक और पारिस्थितिक जीवन को बनाए रखते हैं।

इसलिए जल, जंगल और जमीन के संबंध में लिए जाने वाले निर्णय केवल राजस्व, निवेश या उत्पादन के आधार पर नहीं किए जा सकते। ऐसे निर्णयों में स्थानीय समुदायों की राय, अधिकार, जीवन-पद्धति और दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभाव को केंद्रीय स्थान मिलना चाहिए।

खनिजसंपदा और स्थानीय गरीबी का विरोधाभास

झारखंड देश के सबसे अधिक खनिज-संपन्न राज्यों में है। यहाँ कोयला, लौह अयस्क, तांबा, बॉक्साइट, यूरेनियम और अन्य महत्वपूर्ण खनिज उपलब्ध हैं। इन संसाधनों ने देश के औद्योगिक विकास में बड़ा योगदान दिया है।

लेकिन यह प्रश्न आज भी उपस्थित है कि जिन क्षेत्रों से ये संसाधन निकाले गए, वहाँ रहने वाले समुदायों के जीवन में उसके अनुरूप समृद्धि क्यों नहीं पहुँची। खनन-प्रभावित अनेक क्षेत्रों में आज भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, स्वच्छ पानी, रोजगार और आधारभूत सुविधाओं की कमी दिखाई देती है।

यदि प्राकृतिक संपदा किसी क्षेत्र से निकाली जाती है, लेकिन उससे उत्पन्न लाभ का न्यायपूर्ण हिस्सा स्थानीय नागरिकों तक नहीं पहुँचता, तो वह विकास समावेशी नहीं माना जा सकता।

खनिज-संपदा से होने वाली आय के उपयोग में ग्रामसभाओं की भागीदारी, सामाजिक अंकेक्षण, सार्वजनिक सूचना और स्थानीय प्राथमिकताओं को महत्व देना आवश्यक है। जिला खनिज प्रतिष्ठान निधि सहित संबंधित निधियों और कार्यक्रमों का उपयोग प्रभावित समुदायों की वास्तविक आवश्यकताओं के आधार पर होना चाहिए।

विस्थापन और पुनर्वास का प्रश्न

झारखंड में खनन, बाँध, उद्योग और आधारभूत संरचना परियोजनाओं के कारण बड़ी संख्या में परिवार विस्थापन से प्रभावित हुए हैं। विस्थापन का अर्थ केवल मकान या जमीन का खोना नहीं होता।

इसके साथ आजीविका, सामाजिक संबंध, सामुदायिक सहयोग, सांस्कृतिक स्थल, जल-स्रोत और स्थानीय पहचान भी प्रभावित होते हैं। केवल एकमुश्त आर्थिक मुआवजा इन सभी नुकसानों की भरपाई नहीं कर सकता।

एक न्यायपूर्ण पुनर्वास व्यवस्था में जमीन अथवा स्थायी आजीविका, सुरक्षित आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल-विकास, सामुदायिक पुनर्वास और परियोजना के लाभ में भागीदारी शामिल होनी चाहिए। पुनर्वास को परियोजना शुरू होने के बाद की औपचारिकता नहीं, बल्कि परियोजना की स्वीकृति की अनिवार्य पूर्वशर्त माना जाना चाहिए।

ग्रामसभा और स्वशासन को मजबूत करना होगा

आदिवासी बहुल क्षेत्रों में ग्रामसभा केवल प्रशासनिक बैठक नहीं है। वह सामुदायिक निर्णय, प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन, सामाजिक न्याय और स्थानीय जवाबदेही की मूल संस्था हो सकती है।

पेसा अधिनियम की मूल भावना यह है कि अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभाओं को स्थानीय संसाधनों और समुदाय के जीवन से जुड़े निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका मिले। लेकिन वास्तविक परिवर्तन तभी आएगा, जब ग्रामसभाओं को स्पष्ट अधिकार, आवश्यक जानकारी, वित्तीय संसाधन और निर्णयों के अनुपालन की संस्थागत व्यवस्था उपलब्ध हो।

ग्रामसभा को केवल प्रस्ताव पारित करने वाली संस्था नहीं, बल्कि स्थानीय लोकतंत्र की प्रभावी इकाई बनाना होगा। खनन, भूमि-अधिग्रहण, वन, जल-स्रोत, स्थानीय योजनाओं और सार्वजनिक निधियों से संबंधित निर्णयों में ग्रामसभा की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए।

भाषा और शिक्षा का अधिकार

आदिवासी भाषाएँ केवल संचार का साधन नहीं हैं। उनमें समुदायों का इतिहास, लोक-स्मृति, प्रकृति संबंधी ज्ञान, गीत, कहानियाँ और जीवन-दर्शन संरक्षित रहता है।

जब बच्चे अपनी मातृभाषा से पूरी तरह अलग शिक्षा-व्यवस्था में प्रवेश करते हैं, तो सीखने की प्रक्रिया कठिन हो जाती है। इसलिए प्रारंभिक शिक्षा में मातृभाषा का उपयोग, स्थानीय भाषाओं में शैक्षिक सामग्री और उन भाषाओं से परिचित शिक्षकों की उपलब्धता अत्यंत आवश्यक है।

इसके साथ आदिवासी युवाओं को आधुनिक विज्ञान, तकनीक, डिजिटल शिक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उद्यमिता और रोजगारपरक कौशल से जोड़ना भी जरूरी है। परंपरा और आधुनिकता को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय उनके बीच सम्मानपूर्ण समन्वय स्थापित किया जाना चाहिए।

आदिवासी समाज को लाभार्थी नहीं, भागीदार माना जाए

आदिवासी समुदायों से संबंधित सरकारी नीतियों में अक्सर कल्याणकारी योजनाओं पर अधिक जोर दिया जाता है। योजनाएँ आवश्यक हो सकती हैं, लेकिन केवल योजनाओं से नागरिकों की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित नहीं होती।

आदिवासी समाज को शासन का निष्क्रिय लाभार्थी मानने के बजाय नीति-निर्माण, योजना, कार्यान्वयन, निगरानी और सामाजिक अंकेक्षण में सक्रिय भागीदार बनाया जाना चाहिए।

यह भागीदारी केवल प्रतिनिधित्व की संख्या तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। समुदाय के प्रतिनिधियों को सूचना, प्रशिक्षण, संस्थागत अधिकार और निर्णयों को प्रभावित करने की वास्तविक क्षमता भी मिलनी चाहिए।

विश्व आदिवासी दिवस पर झारखंड के पाँच प्रमुख संकल्प

विश्व आदिवासी दिवस को सार्थक बनाने के लिए झारखंड को पाँच व्यापक संकल्प लेने चाहिए।

1. भूमि और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा

आदिवासी भूमि के अवैध हस्तांतरण को रोकने, लंबित मामलों का समयबद्ध समाधान करने और पारंपरिक सामुदायिक अधिकारों की रक्षा के लिए प्रभावी व्यवस्था स्थापित की जाए।

2. ग्रामसभा और स्थानीय स्वशासन का सशक्तीकरण

अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभाओं को कानून के अनुरूप वास्तविक निर्णयकारी अधिकार, वित्तीय संसाधन और संस्थागत सहायता प्रदान की जाए।

3. न्यायपूर्ण और सहभागी विकास

खनन, उद्योग, बाँध या अन्य परियोजनाओं के संबंध में प्रभावित समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित हो। पुनर्वास, आजीविका और लाभ-साझेदारी की व्यवस्था परियोजना की अनिवार्य शर्त बने।

4. भाषा, शिक्षा और सांस्कृतिक ज्ञान का संरक्षण

आदिवासी भाषाओं को प्रारंभिक शिक्षा, सार्वजनिक संचार और सांस्कृतिक संस्थाओं में उचित स्थान मिले। युवाओं को पारंपरिक ज्ञान के साथ आधुनिक कौशल और तकनीकी अवसरों से जोड़ा जाए।

5. शासन और जवाबदेही में भागीदारी

आदिवासी समुदायों, महिलाओं, युवाओं और स्थानीय संस्थाओं को नीति-निर्माण, योजना की निगरानी और सामाजिक अंकेक्षण में प्रभावी भूमिका दी जाए।

राष्ट्रीय नागरिक निर्माण अभियान की दृष्टि

राष्ट्रीय नागरिक निर्माण अभियान—NCBC—का मानना है कि किसी भी समुदाय को केवल सरकारी योजनाओं का लाभार्थी बनाकर सशक्त नहीं किया जा सकता। वास्तविक सशक्तीकरण तब होता है, जब नागरिक अपने अधिकारों को जानता हो, संस्थाओं तक उसकी पहुँच हो और वह शासन से प्रश्न पूछने तथा जवाबदेही सुनिश्चित करने में सक्षम हो।

आदिवासी समुदायों के संदर्भ में नागरिक सशक्तीकरण का अर्थ उनकी पहचान मिटाकर उन्हें किसी एकरूप व्यवस्था में शामिल करना नहीं है। इसका अर्थ है उनकी विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान का सम्मान करते हुए उनके संवैधानिक अधिकारों, स्वशासन, संस्थागत पहुँच और निर्णयकारी भागीदारी को मजबूत करना।

NCBC ऐसी नागरिक व्यवस्था का समर्थन करता है जिसमें—

  • ग्रामसभा स्थानीय लोकतंत्र की मजबूत इकाई बने;
  • नागरिकों को भूमि, वन और अन्य अधिकारों की व्यावहारिक जानकारी मिले;
  • सरकारी योजनाओं और सार्वजनिक निधियों का सामाजिक अंकेक्षण हो;
  • समुदाय अपनी समस्याओं की पहचान और समाधान-निर्माण में भाग ले;
  • युवाओं और महिलाओं को नागरिक नेतृत्व के अवसर मिलें;
  • प्रशासन और समुदाय के बीच नियमित संवाद एवं जवाबदेही की व्यवस्था बने।

उत्सव से संकल्प की ओर

विश्व आदिवासी दिवस हमें आदिवासी संस्कृति की सुंदरता और विविधता का उत्सव मनाने का अवसर देता है। साथ ही यह हमें याद दिलाता है कि सम्मान का वास्तविक अर्थ अधिकारों की रक्षा, निर्णयों में भागीदारी और न्यायपूर्ण विकास है।

झारखंड में इस दिवस की सार्थकता तभी होगी, जब जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा केवल भाषण का विषय न रहकर शासन की प्राथमिकता बने; जब ग्रामसभा को वास्तविक अधिकार मिले; जब विस्थापन के स्थान पर सम्मानपूर्ण पुनर्वास और लाभ-साझेदारी हो; और जब आदिवासी युवाओं को अपनी पहचान बनाए रखते हुए आधुनिक अवसरों तक समान पहुँच मिले।

आइए, 9 अगस्त को केवल उत्सव का दिन न रहने दें। इसे इतिहास से सीखने, वर्तमान की समीक्षा करने और न्यायपूर्ण भविष्य बनाने के संकल्प-दिवस में परिवर्तित करें।

सभी आदिवासी भाई-बहनों को विश्व आदिवासी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

जल, जंगल और जमीन की सुरक्षाअस्मिता, अधिकार और सम्मानपूर्ण भविष्य की आधारशिला है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *