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दो कार्यकाल की सीमा

दो कार्यकाल की सीमा: 21वीं सदी के युवा को 20वीं सदी की राजनीति से क्यों नहीं चलाया जा सकता

आज झारखंड का युवा सड़क पर है।

भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता, पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर हज़ारों अभ्यर्थी आंदोलन कर रहे हैं। JPSC और JSSC की परीक्षाओं से जुड़े आरोपों ने सिर्फ एक परीक्षा या एक परिणाम का सवाल नहीं उठाया है — उन्होंने वह बड़ा सवाल सामने ला दिया है: क्या हमारे युवाओं को अपने भविष्य के लिए राज्य की संस्थाओं पर अब भी भरोसा है?

इस आंदोलन को देखते हुए मेरे मन में एक सवाल और उठता है — क्या हम केवल आज की सरकार को बदलने या दोषी ठहराने से इस समस्या का समाधान कर सकते हैं? मुझे लगता है, नहीं। समस्या इससे कहीं गहरी है — यह हमारी राजनीतिक प्रतिनिधित्व की संरचना में भी है।

इसी संदर्भ में मैं अपनी किताब वैकल्पिक राजनीति — प्रजा से नागरिक बनने की अधूरी यात्रा के अध्याय 23 में प्रस्तावित एक सुधार सामने रखना चाहता हूँ:

किसी व्यक्ति को किसी निर्वाचित पद पर दो कार्यकाल से अधिक प्रतिनिधित्व करने का अवसर नहीं मिलना चाहिए।

यह प्रस्ताव किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं है। किसी पार्टी के विरुद्ध नहीं है। यह किसी वर्तमान नेता को निशाना बनाने का प्रस्ताव भी नहीं है। यह लोकतंत्र में सत्ता और प्रतिनिधित्व के निरंतर नवीकरण का प्रस्ताव है।

आज का युवा किस दुनिया में प्रवेश कर रहा है?

जिस युवा को हम आज सड़क पर देख रहे हैं, वह सिर्फ़ सरकारी नौकरी का अभ्यर्थी नहीं है। वह एक बिल्कुल अलग दुनिया में प्रवेश कर रही पीढ़ी है — वैश्वीकरण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), स्वचालन, जलवायु परिवर्तन, डिजिटल अर्थव्यवस्था, नई तरह की नौकरियाँ और नई तरह की बेरोज़गारी, तेज़ी से बदलती तकनीक, बदलते सामाजिक संबंध, मानसिक दबाव, नई असमानताएँ।

आज जिस कौशल की ज़रूरत है, वह पाँच साल बाद बदल सकता है। आज जिस उद्योग में रोज़गार है, वहाँ कल स्वचालन आ सकता है। आज जिस तकनीक को हम अवसर मान रहे हैं, वही कल किसी पुराने रोज़गार को ख़त्म कर सकती है।

तो आज के युवा के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ़ “नौकरी कैसे मिले” नहीं है। चुनौती है — मैं लगातार बदलती दुनिया में अपने जीवन को कैसे सुरक्षित, स्वतंत्र, सम्मानजनक और अर्थपूर्ण बनाऊँ?

गरिमामय संस्कार इसी व्यापक सवाल को व्यक्ति, परिवार और समाज के स्तर पर देखती है। पुस्तक की मूल दृष्टि यह है कि गरिमा सिर्फ़ एक सम्मानजनक शब्द नहीं, बल्कि स्वायत्तता, संवाद, असहमति, विश्वास और उत्तरदायित्व से बनी एक जीवन-व्यवस्था है। परिवार और समाज में सीखे गए ये संस्कार आगे चलकर नागरिक जीवन और लोकतंत्र को भी आकार देते हैं।

पर यहाँ एक बड़ा विरोधाभास है — युवा जिस दुनिया में जीने जा रहा है, उसके बारे में फ़ैसले लेने वाली राजनीतिक व्यवस्था कितनी तेज़ी से बदल रही है?

युवा 21वीं सदी का है। राजनीति की मानसिकता कितनी पुरानी है?

मैं यह नहीं कह रहा कि हर बुज़ुर्ग नेता पुरानी सोच का है और हर युवा नेता नई सोच का। यह उम्र का सवाल नहीं, राजनीतिक सोच का सवाल है — 70 साल का व्यक्ति भी नए विचारों के लिए खुला हो सकता है, और 30 साल का व्यक्ति भी बिल्कुल पुरानी राजनीति कर सकता है।

तो असली सवाल यह है — क्या हमारी राजनीतिक व्यवस्था नई सोच को आने देती है? क्या वह नए लोगों को अवसर देती है, असहमति को जगह देती है, नई पीढ़ी को केवल चुनावी भीड़ मानती है या नीति बनाने वाली शक्ति?

क्या एक सामान्य युवा अपने क्षेत्र की राजनीति में सीधे ऊपर आ सकता है, या पहले उसे किसी बड़े नेता के पीछे चलना होगा, फिर किसी गुट में जगह बनानी होगी, फिर किसी परिवार या राजनीतिक नेटवर्क से जुड़ना होगा — और वर्षों बाद शायद उसे टिकट मिलेगा?

अगर व्यवस्था ऐसी है, तो हम लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का विस्तार नहीं, राजनीतिक प्रवेश पर नियंत्रण पैदा कर रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल: एक ही व्यक्ति बार-बार क्यों?

हमारे यहाँ ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ एक व्यक्ति किसी क्षेत्र का चार, पाँच, छह या उससे भी ज़्यादा बार प्रतिनिधित्व करता है। किसी का बार-बार जीतना अपने-आप में अपराध नहीं है — अगर जनता उसे चुनती है, तो उसकी लोकप्रियता का सम्मान होना चाहिए।

पर लोकतंत्र के लिए एक बड़ा सवाल पूछना ज़रूरी है — क्या लोकतंत्र का मकसद सिर्फ़ लोकप्रिय व्यक्ति को बार-बार चुनते रहना है, या ज़्यादा से ज़्यादा नागरिकों को नेतृत्व और प्रतिनिधित्व का अवसर देना भी है?

मेरे हिसाब से लोकतंत्र का दूसरा मकसद उतना ही ज़रूरी है। वैकल्पिक राजनीति की मूल दृष्टि में चुनाव सिर्फ़ सत्ता बदलने की प्रक्रिया नहीं है। अगर वही लोग लगातार लौटते रहें, राजनीति परिवार की विरासत बन जाए और प्रतिनिधित्व की संरचना बंद होती जाए, तो चुनाव होते हुए भी लोकतंत्र की आत्मा अधूरी रह जाती है।

इसीलिए कार्यकाल-सीमा मेरे लिए सिर्फ़ एक चुनावी तकनीक नहीं, लोकतांत्रिक संरचना का सुधार है।

सत्ता में रोटेशन क्यों ज़रूरी है

रोटेशन का मतलब यह नहीं कि अनुभवी व्यक्ति बेकार हो जाता है। अनुभव ज़रूरी है — पर लोकतंत्र में अनुभव का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि एक ही व्यक्ति हमेशा पद पर बना रहे। पुराने नेता का अनुभव समाज की संपत्ति हो सकता है, पर पद पर बने रहना उसका स्थायी अधिकार नहीं होना चाहिए।

यहीं से एक ज़रूरी फ़र्क़ पैदा होता है — अनुभव बना रहे, पद बदले। पुराना नेता सलाह दे सकता है; नई पीढ़ी फ़ैसला ले सकती है। पुराना अनुभव नई ऊर्जा के साथ मिल सकता है। यही नेतृत्व का स्वस्थ संक्रमण है।

आज की राजनीति में “तैयार समाधान” की समस्या

लंबे समय तक सत्ता में रहने का एक और असर होता है — व्यक्ति धीरे-धीरे एक तय राजनीतिक ढाँचे में सोचने लगता है। उसे समस्याओं के कुछ पुराने कारण दिखते हैं, और उनके कुछ पुराने समाधान। फिर हर नई समस्या उसी पुराने ढाँचे में फ़िट की जाने लगती है।

पर दुनिया बदल चुकी होती है। युवा बदल चुका होता है। अर्थव्यवस्था, तकनीक, रोज़गार, समाज — सब बदल चुके होते हैं। सिर्फ़ राजनीतिक जवाब वही रहते हैं। यहीं से “पुरानी लकीर का फ़क़ीर” राजनीति पैदा होती है — समस्या नई, पर परिभाषा पुरानी, समाधान पुराना, संस्था पुरानी, भाषा पुरानी। और फिर हैरानी होती है कि युवा बेचैन क्यों है।

आज का युवा सिर्फ़ नौकरी नहीं माँग रहा

झारखंड में आज युवा भर्ती परीक्षा के सवाल पर आंदोलन कर रहा है — परीक्षा निष्पक्ष हो, नियम स्पष्ट हों, परीक्षा समय पर हो, प्रश्नपत्र सुरक्षित हो, परिणाम विश्वसनीय हो, जाँच निष्पक्ष हो, दोषी पर कार्रवाई हो।

यह सिर्फ़ नौकरी की माँग नहीं है। यह संस्थाओं पर भरोसे की माँग है। और जब युवा किसी संस्था पर भरोसा खोता है, तो समस्या बहुत बड़ी हो जाती है — क्योंकि आज का युवा सिर्फ़ सरकार पर निर्भर नहीं रहना चाहता। वह अपने जीवन का फ़ैसला ख़ुद लेना चाहता है।

यही गरिमामय संस्कार की दृष्टि में स्वायत्तता और गरिमा का सवाल है। गरिमा का मतलब सिर्फ़ यह नहीं कि कोई हमें सम्मान से बुलाए। गरिमा का मतलब है — मैं अपने जीवन के बारे में सोच सकता हूँ, प्रश्न पूछ सकता हूँ, असहमति व्यक्त कर सकता हूँ, फ़ैसले में भाग ले सकता हूँ, अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ सकता हूँ। और लोकतंत्र में यही स्वायत्त व्यक्ति आगे चलकर नागरिक बनता है।

हमारी राजनीति युवा को नागरिक बनाती है या वोटर?

क्या युवा सिर्फ़ वोट देने वाला व्यक्ति है, या लोकतंत्र का सहभागी नागरिक? अगर युवा को सिर्फ़ चुनाव के समय बुलाया जाए — पोस्टर लगाने, भीड़ जुटाने, नारे लगाने, सोशल मीडिया पर प्रचार करने के लिए — और फ़ैसला लेने की मेज़ पर उसकी कोई जगह न हो, तो वह लोकतंत्र में सहभागी नहीं है। वह सिर्फ़ राजनीतिक संसाधन है।

राष्ट्रीय नागरिक निर्माण अभियान (NCBC) का मकसद इसी स्थिति को बदलना है — ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को लोकतांत्रिक क्षमता, भागीदारी और नेतृत्व में लाना। इसकी Foundational Book भी चुनाव को लोकतंत्र की शुरुआत मानती है, पर लोकतंत्र को पूरा बनाने के लिए समान गरिमा, जवाबदेही, संवाद और न्याय को दैनिक तथा संस्थागत व्यवहार का हिस्सा मानती है।

परिवारवाद, वंशवाद और व्यक्ति-केंद्रित राजनीति कहाँ से आती है?

हम अक्सर परिवारवाद, वंशवाद और राजनीतिक भ्रष्टाचार की शिकायत करते हैं, पर उनके संस्थागत कारण भी देखने चाहिए। जब कोई व्यक्ति किसी क्षेत्र का लंबे समय तक निर्विवाद राजनीतिक केंद्र बन जाता है, तो धीरे-धीरे उसके आसपास एक नेटवर्क बनता है। फिर राजनीति और व्यक्ति में फ़र्क़ कम होने लगता है, पार्टी और व्यक्ति में फ़र्क़ कम होने लगता है, क्षेत्र और परिवार में फ़र्क़ कम होने लगता है — और अंततः निर्वाचन क्षेत्र नागरिकों का लोकतांत्रिक क्षेत्र न रहकर किसी राजनीतिक परिवार का प्रभाव-क्षेत्र बन सकता है।

इसी स्थिति से हमें सावधान रहना चाहिए। इसीलिए वैकल्पिक राजनीति में नेतृत्व-रोटेशन को व्यापक प्रतिनिधित्व की दिशा में रखा गया है — कार्यकाल सीमा सत्ता में रोटेशन नए नेतृत्व का रास्ताऔर इसके साथ महिला प्रतिनिधित्व, आंतरिक लोकतंत्र तथा परिवारवाद-विरोधी सुधारों को जोड़ा गया है। यानी दो कार्यकाल की सीमा अकेला सुधार नहीं, प्रतिनिधित्व खोलने वाले सुधारों की एक शृंखला का पहला हिस्सा है।

दो कार्यकाल की सीमा क्यों?

मेरा प्रस्ताव सरल है: किसी व्यक्ति को किसी निर्वाचित सार्वजनिक पद पर अधिकतम दो बार प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिले — सिर्फ़ विधायक या सांसद के लिए नहीं, जहाँ भी लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित पद हैं, वहाँ इस सिद्धांत पर विचार होना चाहिए।

क्यों? क्योंकि लोकतंत्र का मतलब है ज़्यादा लोगों की भागीदारी। अगर एक व्यक्ति दो कार्यकाल के बाद पद छोड़ता है, तो उसके क्षेत्र में नेतृत्व की नई संभावना पैदा होती है — नया व्यक्ति, नई महिला, कोई युवा, किसी वंचित समुदाय का व्यक्ति, कोई शिक्षक, डॉक्टर, किसान, इंजीनियर, सामाजिक कार्यकर्ता या उद्यमी — किसी ऐसे व्यक्ति को अवसर मिल सकता है जिसके पास राजनीतिक परिवार नहीं, पर समाज के लिए नया विचार है।

क्या इससे अनुभव ख़त्म हो जाएगा? यह सबसे सामान्य आपत्ति होगी। मेरा जवाब — नहीं। पद की सीमा अनुभव की सीमा नहीं है। दो कार्यकाल के बाद भी विधायक के पास आठ-दस साल का अनुभव होगा; वह सार्वजनिक जीवन से बाहर नहीं होगा — विचार दे सकता है, सलाह दे सकता है, नीति-निर्माण में योगदान दे सकता है, प्रशिक्षण दे सकता है, सामाजिक जीवन में सक्रिय रह सकता है। पर लोकतांत्रिक पद पर किसी दूसरे नागरिक के लिए भी जगह बनेगी। यही तो लोकतंत्र है।

और अगर जनता उसी व्यक्ति को फिर चुनना चाहे? इसका जवाब है — लोकतंत्र सिर्फ़ मतदाता की पसंद का नाम नहीं है; लोकतंत्र प्रतिनिधित्व के अवसरों को व्यापक बनाने वाली संस्थागत व्यवस्था भी है। जैसे हम चुनाव में उम्र की सीमा, अयोग्यता के नियम, कार्यकाल की कुछ संवैधानिक सीमाएँ, आरक्षण, निर्वाचन प्रक्रिया जैसे नियम स्वीकार करते हैं, वैसे ही अधिकतम दो कार्यकाल की सीमा भी लोकतांत्रिक डिज़ाइन का एक नियम हो सकती है।

यह विचार संवैधानिक और विधिक रूप से जटिल हो सकता है, और इसके लिए गंभीर सार्वजनिक विमर्श तथा उपयुक्त कानूनी/संवैधानिक प्रक्रिया चाहिए होगी। पर कठिन होना किसी विचार को चर्चा से बाहर करने की वजह नहीं है। अगर लोकतंत्र में नई पीढ़ी के लिए जगह बनानी है, तो इस सवाल पर बहस करनी ही होगी।

युवा आंदोलन को यहीं से अगला सवाल पूछना चाहिए

आज झारखंड का युवा पूछ रहा है — “मेरी परीक्षा निष्पक्ष क्यों नहीं?” मैं चाहता हूँ यह सवाल आगे बढ़े। युवा पूछे — “मेरी संस्था विश्वसनीय क्यों नहीं?” फिर — “मेरे प्रतिनिधि ने पिछले पाँच सालों में क्या किया?” फिर — “विधानसभा ने सरकार से क्या पूछा?” और अंततः — “क्या हमारी राजनीतिक व्यवस्था में मेरे जैसे नए नागरिक के लिए नेतृत्व की जगह है?”

यहीं आंदोलन नागरिक आंदोलन बनता है। क्योंकि लोकतंत्र सिर्फ़ सरकार से माँग करने का नाम नहीं है — लोकतंत्र व्यवस्था को बदलने की नागरिक क्षमता का नाम भी है।

21वीं सदी को 20वीं सदी की राजनीति से नहीं चलाया जा सकता

AI सिर्फ़ नौकरियाँ नहीं बदलेगा — वह फ़ैसले लेने, शिक्षा, प्रशासन और ज्ञान की प्रकृति भी बदल रहा है। जलवायु परिवर्तन सिर्फ़ पर्यावरण का सवाल नहीं — यह रोज़गार, खेती, शहर, स्वास्थ्य और विस्थापन का सवाल है। स्वचालन सिर्फ़ उद्योग का सवाल नहीं — यह श्रम और सामाजिक सुरक्षा की नई परिभाषा लिखेगा। वैश्वीकरण सिर्फ़ व्यापार का सवाल नहीं — यह स्थानीय अर्थव्यवस्था और युवाओं के अवसरों को प्रभावित करेगा। डिजिटल समाज सिर्फ़ मोबाइल फ़ोन का सवाल नहीं — यह नागरिकता, सूचना, गोपनीयता, सामाजिक संबंध और लोकतांत्रिक संवाद को बदल रहा है।

गरिमामय संस्कार की दृष्टि में डिजिटल युग इसीलिए सिर्फ़ तकनीकी बदलाव नहीं है — तकनीक संबंधों और समाज को मज़बूत भी कर सकती है, और अगर संवेदनशीलता व संवाद कमज़ोर हों तो उन्हें कमज़ोर भी कर सकती है।

तो सवाल यह है — क्या हमारा राजनीतिक नेतृत्व भी उतनी ही तेज़ी से सीख रहा है? अगर नहीं, तो युवा और राजनीति के बीच दूरी बढ़ती जाएगी।

नई पीढ़ी को सिर्फ़ सुनना नहीं, सत्ता की संरचना में जगह देना होगा

हम अक्सर कहते हैं — “युवा देश का भविष्य हैं।” पर यह वाक्य मुझे अधूरा लगता है। युवा सिर्फ़ भविष्य नहीं हैं — युवा वर्तमान भी हैं। आज की नीतियों का असर आज उसी पर पड़ रहा है; आज की बेरोज़गारी वही झेल रहा है; आज की परीक्षा-व्यवस्था में वही फँस रहा है; आज के जलवायु संकट का असर वही लंबे समय तक झेलेगा; आज की AI क्रांति में उसी को अपना कौशल बदलना होगा।

इसलिए युवा को सिर्फ़ “भविष्य का नेता” कहकर टालना ग़लत है। उसे आज के फ़ैसले में जगह चाहिए। और इसके लिए सिर्फ़ युवाओं को राजनीति में बुलाना काफ़ी नहीं — राजनीतिक संरचना को नए लोगों के लिए खुलना होगा।

दो कार्यकाल की सीमा असल में “फ्रेश एयर” का प्रस्ताव है

किसी संस्था में लंबे समय तक एक ही नेतृत्व रहने से एक तरह की संस्थागत जड़ता पैदा होती है — नई आवाज़ें कम होती जाती हैं, असहमति कमज़ोर होती है, फ़ैसले कुछ लोगों तक सीमित हो जाते हैं, नई प्रतिभाएँ बाहर रहती हैं, और धीरे-धीरे संस्था व्यक्ति-केंद्रित होने लगती है।

इसीलिए मैं दो कार्यकाल की सीमा को “फ्रेश एयर इन डेमोक्रेसी” कहता हूँ। नई हवा का मतलब पुराना अनुभव फेंकना नहीं — नई हवा का मतलब है खिड़की खुली रखना।

यही लोकतंत्र का लोकतंत्रीकरण है

वैकल्पिक राजनीति का मूल आग्रह सरकार बदलने से बड़ा है — प्रतिनिधित्व की संरचना बदलो। जनता को सिर्फ़ वोटर मत बनाओ, उसे नागरिक बनाओ। प्रतिनिधि को जनता से ऊपर मत रखो, उसे जनता के प्रति उत्तरदायी बनाओ। राजनीति को किसी परिवार की विरासत मत बनने दो, उसे नागरिकों की सार्वजनिक सेवा का क्षेत्र बनाओ। और सत्ता को स्थायी कब्ज़े में बदलने से रोकने के लिए रोटेशन की व्यवस्था बनाओ। यही लोकतंत्र का लोकतंत्रीकरण है।

मेरा युवाओं से आग्रह

आज मैं झारखंड के युवाओं से एक आग्रह करना चाहता हूँ — आपका आंदोलन सिर्फ़ यह तय करने तक सीमित न रहे कि किसी परीक्षा में क्या हुआ। उससे आगे जाइए। पूछिए — ऐसी परीक्षा व्यवस्था बनी क्यों नहीं जो बार-बार विवाद में न आए? विधानसभा ने वर्षों तक क्या किया? हमारे राजनीतिक दलों के भीतर नए नेतृत्व के लिए कितनी जगह है? एक सामान्य नागरिक राजनीति में ऊपर कैसे आएगा? एक ही व्यक्ति को लगातार कई-कई बार प्रतिनिधित्व करने की ज़रूरत क्यों है?

और सबसे ज़रूरी — क्या लोकतंत्र का मतलब सिर्फ़ यह है कि हम हर पाँच साल में पुराने चेहरों में से किसी एक को चुनें? या लोकतंत्र का मतलब यह भी है कि हर पाँच साल में समाज के नए हिस्सों को नेतृत्व में आने का अवसर मिले?

NCBC का आग्रह: समर्थक नहीं, नागरिक बनिए

किसी पार्टी का समर्थक बनना आसान है। नागरिक बनना कठिन है। समर्थक पूछता है — “मेरी पार्टी सही है या ग़लत?” नागरिक पूछता है — “सही क्या है?” समर्थक पूछता है — “मेरे नेता के पक्ष में कौन है?” नागरिक पूछता है — “जनता के पक्ष में क्या है?” समर्थक अपने नेता को बचाता है; नागरिक लोकतांत्रिक संस्था को मज़बूत करता है।

यही वजह है कि NCBC में नागरिक-निर्माण सिर्फ़ जानकारी देने का कार्यक्रम नहीं है। इसका मक़सद ऐसे नागरिक तैयार करना है जो सीखें, संवाद करें, प्रमाण देखें, संगठित हों, कार्रवाई करें और संस्थाओं से जवाबदेही माँगें।

अंततः सवाल किसी नेता का नहीं, लोकतंत्र का है

मेरा मक़सद यह कहना नहीं कि जो नेता चार बार जीता है वह ख़राब है, न ही यह कि नया व्यक्ति अपने-आप बेहतर होगा। मेरा सवाल व्यक्ति की अच्छाई-बुराई से बड़ा है — यह व्यवस्था का सवाल है। क्या लोकतंत्र में नेतृत्व कुछ व्यक्तियों के आसपास स्थायी रूप से जमा होना चाहिए, या समाज में लगातार नए लोग आगे आते रहने चाहिए? क्या राजनीति कुछ परिवारों की विरासत हो, या हर नागरिक के लिए खुला क्षेत्र? क्या युवा सिर्फ़ वोट दे, या नीति भी बनाए? क्या पुराना अनुभव ही अंतिम सत्य हो, या नई पीढ़ी को सवाल पूछने और नए जवाब खोजने का अवसर मिले?

मेरे हिसाब से लोकतंत्र का स्वास्थ्य इसी बात पर निर्भर करता है कि उसमें सत्ता का प्रवेश-द्वार कितना खुला है, और सत्ता से बाहर निकलने की व्यवस्था कितनी स्वस्थ है।

इसलिए मैं मानता हूँ — किसी निर्वाचित व्यक्ति को किसी निर्वाचित पद पर दो कार्यकाल से अधिक प्रतिनिधित्व का अवसर नहीं मिलना चाहिए। यह किसी नेता को हटाने की राजनीति नहीं, नए नेतृत्व को जन्म देने की राजनीति है। यह अनुभव के विरुद्ध नहीं, अनुभव और नवीकरण के बीच संतुलन है। यह युवा-विरोधी व्यवस्था के विरुद्ध एक सुधार है, परिवारवाद और व्यक्ति-केंद्रित राजनीति के विरुद्ध एक संरचनात्मक उपाय है — और सबसे बढ़कर, यह लोकतंत्र में ज़्यादा से ज़्यादा नागरिकों की भागीदारी का आग्रह है।

आज का युवा 21वीं सदी की दुनिया का सामना कर रहा है। उसे 19वीं या 20वीं सदी की जड़ राजनीतिक मानसिकता के हवाले नहीं किया जा सकता। उसे ऐसी राजनीति चाहिए जो सीखती हो, सुनती हो, बदलती हो, नई पीढ़ी को जगह देती हो, और जनता को सिर्फ़ वोटर नहीं, लोकतंत्र का स्वामी नागरिक मानती हो।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह नहीं कि पुराने नेता कितने लंबे समय तक टिक सकते हैं। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह है कि नए नागरिकों के लिए दरवाज़ा हमेशा खुला रहे।


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