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MMDR Amendment Bill 2026

MMDR Amendment Bill 2026: खनिज पर किसका अधिकार — केंद्र, राज्य या स्थानीय समुदाय?

भारत की संसद ने अगस्त 2026 में MMDR Amendment Bill, 2026 — Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026, यानी खानों और खनिजों के विकास एवं विनियमन से संबंधित संशोधन विधेयक — दोनों सदनों से पारित कर दिया है। 16 अगस्त 2026 तक उपलब्ध आधिकारिक स्थिति में इसे संसद से पारित Bill कहना अधिक सावधानीपूर्ण है; राष्ट्रपति की assent की औपचारिक पुष्टि के बाद ही इसे Amendment Act कहना उचित होगा।

पहली नजर में यह खनन उद्योग से जुड़ा एक तकनीकी संशोधन लगता है। असल में इसमें दो अलग बदलाव एक साथ हुए हैं, और दोनों झारखंड जैसे खनिज-संपन्न राज्य के लिए गहरे मायने रखते हैं। पहला — राज्य अब मिनरल राइट्स और मिनरल-बेयरिंग लैंड पर कितना टैक्स या सेस लगा सकेंगे, इसकी मुख्य सीमा केंद्र सरकार तय करेगी। दूसरा — मिनरल-बेयरिंग लैंड, यानी जिस जमीन में खनिज मौजूद है, वह जमीन खुद भी अब केंद्र के रेगुलेटरी दायरे में आ जाएगी। पहला बदलाव राजस्व का सवाल है; दूसरा जमीन पर नियंत्रण का। दोनों मिलकर तय करते हैं कि आने वाले वर्षों में दिल्ली, रांची और खनन-प्रभावित गांव के बीच शक्ति का संतुलन किस तरफ झुकेगा।

खनिज पर बहस केवल दिल्ली बनाम रांची की नहीं है। तीसरा पक्ष वह स्थानीय समुदाय है जिसकी जमीन, जंगल, पानी और जीवन खनन से सीधे प्रभावित होते हैं।

पहले जरूरी तकनीकी शब्द समझें

  • MMDR — Mines and Minerals (Development and Regulation) — खानों और खनिज विकास के नियमन से संबंधित केंद्रीय विधिक ढांचा।
  • Mineral Rights — खनिज को कानून के अनुसार खोजने, निकालने और उसका आर्थिक उपयोग करने का वैधानिक अधिकार। यह जमीन की सामान्य ownership से अलग अवधारणा है।
  • Mineral-bearing land — ऐसी भूमि जिसमें खनिज मौजूद हों।
  • Royalty — खनन पट्टा रखने वाली कंपनी या व्यक्ति द्वारा खनिज निकालने के बदले दिया जाने वाला वैधानिक भुगतान। Supreme Court ने 2024 में स्पष्ट किया कि royalty स्वयं tax नहीं है।
  • Tax — कानून के आधार पर सरकार द्वारा लगाया गया अनिवार्य कर, जिसके बदले समान मूल्य की कोई प्रत्यक्ष सेवा देना आवश्यक नहीं होता।
  • Cess — किसी विशेष आधार या उद्देश्य से लगाया गया कर/उपकर।
  • Revenue — सरकार को tax, royalty, auction premium और अन्य स्रोतों से मिलने वाली आय; revenue स्वयं कोई अलग tax नहीं है।
  • PRS Legislative Research — संसदीय Bills, Acts और नीतियों का स्वतंत्र विश्लेषण करने वाली शोध संस्था; यह Parliament, Government या Court नहीं है।

संविधान की Entry 49, Entry 50 और Entry 54

भारत के संविधान की Seventh Schedule (सातवीं अनुसूची) में केंद्र और राज्यों के विधायी विषय बांटे गए हैं। इस विवाद में तीन Entries विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।

संवैधानिक Entryसरल अर्थइस विवाद में महत्व
Entry 49 — State Listजमीन और भवन पर taxMineral-bearing land पर राज्य की land-tax power का आधार।
Entry 50 — State ListMineral rights पर taxराज्य को mineral rights पर tax power; लेकिन Parliament mineral development संबंधी कानून द्वारा “limitations” लगा सकती है।
Entry 54 — Union ListMines और mineral development का regulationराष्ट्रीय स्तर पर mining regulation और MMDR framework का संवैधानिक आधार।

एक वाक्य में: Entry 49 जमीन पर tax से जुड़ी है; Entry 50 mineral rights पर tax से; और Entry 54 mining/mineral development के राष्ट्रीय regulation से।

2024 में Supreme Court ने क्या स्पष्ट किया?

2024 में Supreme Court की नौ-न्यायाधीशों की Constitution Bench (महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न तय करने वाली बड़ी पीठ) ने बहुमत से कहा कि royalty tax नहीं है और केवल MMDR Act तथा royalty व्यवस्था होने से राज्यों की Entry 50 के तहत mineral rights पर tax लगाने की constitutional power अपने-आप समाप्त नहीं हो जाती। Court ने mineral-bearing land के संदर्भ में Entry 49 की अलग प्रकृति पर भी जोर दिया।

इस निर्णय से राज्यों को यह संवैधानिक आधार मिला कि वे, लागू कानूनों के अधीन, mineral rights या mineral-bearing land के संबंध में अतिरिक्त taxation की संभावनाएँ तलाश सकते हैं। झारखंड ने इसी व्यापक पृष्ठभूमि में Mineral Bearing Land Cess की व्यवस्था बनाई। 2026 का संशोधन इसी 2024 वाले संवैधानिक आधार को सीधे संबोधित करता है — और यहीं से मौजूदा विवाद जन्म लेता है।

2026 Amendment में क्या बदला — दो हिस्सों में समझें

पहला हिस्सा Section 9D है। इसका प्रभाव यह है कि State Government mineral rights या mineral-bearing land पर tax, cess या अन्य levy (अनिवार्य सरकारी वसूली) केवल उन conditions or restrictions के अनुरूप लगा सकेगी जिन्हें Central Government rules के माध्यम से prescribe करेगी। संविधान ने Entry 50 में Parliament को limitations लगाने की अनुमति जरूर दी है, लेकिन पारित Bill में उन substantive limitations — यानी मूल और वास्तविक सीमाओं — को स्वयं Act में विस्तार से निर्धारित करने के बजाय Central Government के future rules पर छोड़ा गया है।

दूसरा हिस्सा उतना ही महत्वपूर्ण है, पर अक्सर कम चर्चा पाता है। Bill, MMDR Act की Section 2 में संशोधन करके mineral-bearing land को भी सीधे Union के regulatory control के दायरे में लाता है। अब तक Union का यह control मुख्यतः mines और mineral development तक — Entry 54 के आधार पर — सीमित समझा जाता था; मिनरल-बेयरिंग land, विशेषकर Entry 49 के अंतर्गत, राज्य के land-tax अधिकार क्षेत्र से जुड़ी मानी जाती रही है। अब यह भूमि किन parameters के आधार पर ‘mineral-bearing’ मानी जाएगी, यह भी Central Government तय करेगी। कानूनी विश्लेषकों ने इस प्रावधान पर एक अलग सवाल उठाया है — केवल परिभाषा या parameter तय करके किसी भूमि-श्रेणी को Entry 54 की declaration में समेट लेना, संविधान द्वारा राज्य को दी गई taxation power को स्वतः समाप्त नहीं कर सकता। यानी यह प्रश्न केवल tax/cess की सीमा तक सीमित नहीं है; यह mineral-bearing land पर regulatory competence किसके पास है, इस सवाल से भी जुड़ा है — और यह अपने आप में एक स्वतंत्र संवैधानिक चुनौती का आधार बन सकता है।

दोनों हिस्सों को साथ रखकर देखें तो तस्वीर साफ होती है: Section 9D राज्य की taxation शक्ति पर सीमा लगाता है, और Section 2 संशोधन मिनरल-बेयरिंग land पर स्वयं Union का दावा विस्तृत करता है। पहला राज्य की जेब से जुड़ा प्रश्न है, दूसरा राज्य के अधिकार-क्षेत्र से। दोनों मिलकर राज्य की fiscal और regulatory — दोनों तरह की — स्वायत्तता को प्रभावित करते हैं।

क्या राज्य की संवैधानिक taxation power और भूमि पर उसके नियामक अधिकार-क्षेत्र, दोनों पर लगने वाली मुख्य सीमाएँ Parliament को स्वयं Act में तय करनी चाहिए थीं, या उन्हें बाद की executive rule-making पर छोड़ा जा सकता है?

केंद्र सरकार का तर्क क्या है?

  • अलग-अलग राज्यों की अलग taxes, cesses और levies से mining cost अनिश्चित हो सकती है।
  • खनन में निवेश दीर्घकालीन होता है; लगातार बदलती levies investment decisions को प्रभावित कर सकती हैं।
  • अत्यधिक cumulative burden से घरेलू mineral महंगा हो सकता है और imports को बढ़ावा मिल सकता है।
  • इसलिए national predictability — यानी देशभर में स्पष्ट और पहले से अनुमानित fiscal framework — जरूरी है।

यह तर्क पूरी तरह निराधार नहीं है। खनन जैसे capital-intensive sector में policy certainty का आर्थिक महत्व होता है।

झारखंड की चिंता क्यों वास्तविक है?

झारखंड के लिए mining केवल revenue का स्रोत नहीं है; इसके साथ भूमि उपयोग, जंगल, विस्थापन, जलस्रोत, सड़कें, प्रदूषण, स्वास्थ्य और स्थानीय infrastructure की लागत जुड़ी होती है। इन सामाजिक और पर्यावरणीय external costs (ऐसी लागतें जो पूरी तरह कंपनी की accounting cost में नहीं दिखतीं) का बड़ा हिस्सा स्थानीय राज्य और समुदाय उठाते हैं।

इसलिए प्रश्न यह है कि यदि राज्य अपनी विशेष mining-related costs की भरपाई के लिए अतिरिक्त cess लगाना चाहे, तो उसकी fiscal autonomy — यानी अपने राजस्व संबंधी निर्णय लेने की स्वतंत्रता — कितनी बचेगी? और यदि उसी भूमि पर नियामक अधिकार भी सिमट जाए, तो स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने की गुंजाइश और घट जाती है।

क्या केंद्र अब झारखंड की royalty और बाकी mining revenue ले लेगा?

नहीं। इस विवाद को इस तरह प्रस्तुत करना सही नहीं होगा कि केंद्र झारखंड की सारी mining income ले रहा है। Royalty, auction premium, dead rent, DMF और अन्य statutory payments की मौजूदा संरचना अलग-अलग कानूनी आधारों पर चलती है और Bill का मुख्य विवाद अतिरिक्त state tax/cess लगाने की स्वतंत्रता तथा mineral-bearing land पर नियामक अधिकार को केंद्रीय शर्तों के अधीन करने को लेकर है।

Auction Premium, DMF और अन्य payments को समझें

  • Auction Premium — खनन ब्लॉक की नीलामी में सफल bidder द्वारा “value of mineral dispatched” — नियमों के अनुसार dispatch किए गए mineral के निर्धारित मूल्य — का quote किया गया प्रतिशत, जो राज्य को देय होता है। यह royalty से अलग payment है।
  • DMF — District Mineral Foundation, खनन-प्रभावित जिलों और लोगों के हित में स्थापित जिला खनिज प्रतिष्ठान। इसका उद्देश्य mining-affected people और areas के विकास तथा कल्याण पर खर्च करना है।
  • Dead Rent — कुछ परिस्थितियों में mining lease holder द्वारा देय minimum-type annual payment; royalty और dead rent में लागू नियम के अनुसार अधिक राशि देय हो सकती है।
  • NMET/NMEDT — राष्ट्रीय स्तर पर mineral exploration/development से जुड़ा statutory fund/trust contribution; इसे राज्य का सामान्य freely spendable revenue नहीं समझना चाहिए।

मामला केवल केंद्र बनाम राज्य नहीं है

झारखंड के अनेक आदिवासी क्षेत्र Fifth Schedule Areas (संविधान की पाँचवीं अनुसूची के तहत विशेष संरक्षण प्राप्त Scheduled Areas) हैं। इनके साथ PESA — Panchayats (Extension to Scheduled Areas) Act, 1996, यानी Scheduled Areas में ग्रामसभा और पंचायतों को विशेष भूमिका देने वाला कानून — तथा FRA — Forest Rights Act, 2006, यानी वन-आश्रित समुदायों के मान्य वन अधिकारों का कानून — भी relevant हो सकते हैं।

इसलिए mining policy में तीन स्तरों को साथ देखना चाहिए: Centre का national regulatory interest; State का fiscal interest; और mining-affected local community/Gram Sabha का land-resource-rights तथा benefit-sharing interest। जब भूमि पर नियंत्रण भी केंद्रीकृत होता है, तो यह तीसरा पक्ष — गांव और ग्रामसभा — बातचीत की मेज से और दूर हो जाता है।

पुराने बकाए का विवाद

Bill का एक विवादास्पद पहलू यह भी है कि commencement (कानून लागू होने की तारीख) से पहले का ऐसा state levy जो collect या recover नहीं हुआ है, उसे invalid करने का प्रावधान है, जबकि पहले से जमा राशि वापस नहीं की जानी है। इससे समान liability वाले paying और non-paying entities के बीच differential treatment का प्रश्न उठ सकता है।

Bill को अधिक balanced कैसे बनाया जा सकता था?

यहाँ केवल विरोध करने के बजाय एक constructive alternative संभव था। यदि Parliament मानती है कि Entry 50 के तहत national limitations जरूरी हैं, तो बेहतर legislative design यह हो सकता था कि उन limitations के मूल सिद्धांत और outer boundaries स्वयं Act में स्पष्ट की जातीं। Central Government को केवल implementation और procedural details के लिए rules बनाने की शक्ति दी जाती — चाहे वह taxation की सीमा हो या मिनरल-बेयरिंग land की पहचान के parameters।

  • Act में national objective स्पष्ट हो: mining fiscal regime predictable और economically viable रहे।
  • Act में substantive ceiling या permissible band का framework तय हो; rate/limit का मूल आधार future executive discretion पर न छोड़ा जाए।
  • उस national band के भीतर mineral-rich States को अपनी local परिस्थितियों के अनुसार सीमित flexibility मिले।
  • Environmental damage, infrastructure burden, displacement और rehabilitation जैसी राज्य-विशिष्ट लागतों को मान्यता देने का प्रावधान हो।
  • Fifth Schedule/PESA क्षेत्रों और heavily mined districts के लिए विशेष safeguard या additional limited fiscal window पर विचार हो।
  • Central Government rules calculation, return filing, compliance, audit और procedure जैसी details तक सीमित रहें — mineral-bearing land के parameters तय करने में भी यही अनुशासन लागू हो।

क्यों मुख्य limitations Parliament को Act में तय करनी चाहिए?

Delegated legislation (मूल कानून के बाद सरकार द्वारा बनाए जाने वाले subordinate rules) लोकतांत्रिक शासन में सामान्य और आवश्यक है। लेकिन मूल policy choice और administrative detail में फर्क होता है। यदि किसी constitutional State taxation power अथवा भूमि पर उसके अधिकार-क्षेत्र की substantive सीमा तय करनी है, तो उसे Parliament में खुली बहस, amendments और दोनों सदनों की स्वीकृति के बाद statute में रखना federal legitimacy को मजबूत कर सकता है।

Rajya Sabha विशेष रूप से Council of States — राज्यों की परिषद — है। इसलिए राज्यों की fiscal autonomy और regulatory अधिकार-क्षेत्र को सीधे प्रभावित करने वाली मुख्य limitations पर Rajya Sabha सहित Parliament में substantive debate होना संघीय दृष्टि से अधिक उपयुक्त होता।

एक और विकल्प: Guided Discretion

यदि सभी numerical limits Act में देना व्यवहारिक न हो, तब भी Parliament Act में binding principles दे सकती थी। उदाहरण के लिए Central Government limitations तय करते समय अनिवार्य रूप से निम्न factors पर विचार करे:

  • mining operation की economic viability
  • mineral का strategic/national importance
  • राज्य की mineral revenue पर निर्भरता
  • environmental और infrastructure burden
  • displacement और rehabilitation cost
  • Fifth Schedule/PESA areas के हित
  • royalty, auction premium, DMF तथा अन्य levies का cumulative burden

इससे Central Government की discretion guided discretion — यानी Act में दिए स्पष्ट principles से बंधी हुई शक्ति — बनती, न कि लगभग open-ended discretion।

एक cooperative federal model भी संभव था

एक Mineral Fiscal Council जैसे inter-governmental mechanism पर भी विचार किया जा सकता था, जिसमें Centre और प्रमुख mineral-producing States की संस्थागत भागीदारी हो। Parliament broad framework और outer limits तय करे; राज्यों को निर्धारित band के भीतर flexibility मिले; और mining-affected local communities के लिए benefit-sharing safeguards mandatory हों।

झारखंड के लिए असली सवाल

खनिज संपदा से पैदा होने वाली आर्थिक समृद्धि को झारखंड के नागरिकों की समृद्धि में बदलने का institutional mechanism क्या है?

इस बहस को केवल संभावित हजारों करोड़ रुपये के राजस्व नुकसान तक सीमित नहीं करना चाहिए। यदि राज्य को अधिक revenue मिले लेकिन mining belt का नागरिक गरीब, प्रदूषित और विस्थापित जीवन जीता रहे, तो केवल State exchequer का बढ़ना पर्याप्त उपलब्धि नहीं है। और यदि national uniformity के नाम पर State तथा local community दोनों की voice कमजोर हो जाए, तो वह भी संतुलित federalism नहीं है।

निष्कर्ष: विरोध से आगे, बेहतर कानून की दिशा

भारत को predictable mining regime चाहिए। राज्यों को पर्याप्त fiscal space भी चाहिए। और खनन-प्रभावित समुदायों को वास्तविक benefit-sharing तथा निर्णय-प्रक्रिया में स्थान चाहिए। इन तीनों को एक साथ साधना ही balanced policy होगी।

इसलिए अधिक संतुलित formulation यह होता: Parliament national limits के मूल सिद्धांत और boundaries — चाहे taxation से जुड़े हों या mineral-bearing land की पहचान से — स्वयं Act में तय करे; Central Government उन सीमाओं के भीतर procedural rules बनाए; mineral-producing States को reasonable flexibility मिले; और Fifth Schedule तथा mining-affected areas के लिए स्पष्ट safeguards हों।

खनिज राष्ट्रीय विकास का साधन हो सकते हैं, लेकिन खनन की स्थानीय कीमत को राष्ट्रीय नीति में अदृश्य नहीं किया जा सकता।

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