झारखंड में विधायक का वेतन उसके क्षेत्र की प्रति व्यक्ति आय से क्यों जुड़ना चाहिए?
युवा आंदोलन, भर्ती संकट और 25 वर्षों की सामूहिक राजनीतिक जवाबदेही का प्रश्न
आज झारखंड में युवा सड़क पर हैं। सरकारी भर्ती परीक्षाओं की निष्पक्षता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता को लेकर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। JPSC और JSSC से जुड़ी कथित अनियमितताओं के विरोध में चल रहा आंदोलन जुलाई 2026 के अंतिम सप्ताह से लगातार बढ़ा है और अगस्त में विधानसभा तक मार्च, पुलिस कार्रवाई, बंद और राजनीतिक प्रदर्शनों तक पहुँच गया है। छात्र जाँच, जवाबदेही और परीक्षा-व्यवस्था में सुधार की माँग कर रहे हैं।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को देखते हुए मेरे मन में एक अलग प्रश्न उठता है।
क्या यह संकट केवल वर्तमान सरकार की विफलता है? क्या विपक्ष इससे पूरी तरह मुक्त है? या यह झारखंड की पिछले पच्चीस वर्षों की सामूहिक राजनीतिक और संस्थागत विफलता है?
मैं तीसरी बात को अधिक महत्वपूर्ण मानता हूँ।
समस्या को दलगत चश्मे से देखने की सीमा
आज लगभग प्रत्येक राजनीतिक दल इस आंदोलन को अपनी राजनीतिक स्थिति के अनुसार देख रहा है। विपक्ष वर्तमान सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहा है। सरकार विपक्ष पर आंदोलन के राजनीतिकरण का आरोप लगा रही है। यहाँ तक कि सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर भी छात्रों के समर्थन को लेकर अलग-अलग राजनीतिक स्वर सामने आए हैं।
लोकतंत्र में सरकार से सवाल करना विपक्ष का अधिकार और कर्तव्य है। वर्तमान सरकार अपनी अवधि में हुई विफलताओं से बच नहीं सकती।
लेकिन बात यहीं समाप्त नहीं होती।
झारखंड 15 नवंबर 2000 को बना। तब से राज्य में BJP के नेतृत्व वाली सरकारें रही हैं, JMM के नेतृत्व वाली सरकारें रही हैं, Congress और RJD जैसी पार्टियाँ गठबंधन सरकारों का हिस्सा या समर्थक रही हैं, JMM और BJP स्वयं भी एक समय साथ सरकार चला चुके हैं, और एक निर्दलीय मुख्यमंत्री की सरकार भी रही है। इसलिए आज के गठबंधनों—NDA और INDIA—के नामों को पूरे 25 वर्षों पर पीछे से लागू करना ऐतिहासिक रूप से ठीक नहीं होगा, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि आज दोनों राजनीतिक खेमों में शामिल लगभग सभी प्रमुख दल झारखंड की सत्ता-व्यवस्था में किसी न किसी रूप में भागीदार रहे हैं।
इसलिए भर्ती-व्यवस्था का संकट केवल किसी एक दल की कहानी नहीं है।
JPSC की परीक्षा प्रणाली पर विवाद भी कोई 2026 में अचानक पैदा हुई घटना नहीं है। सार्वजनिक रिकॉर्ड में 2003 तक के पेपर-लीक आरोप, बाद की परीक्षाओं में अनियमितताओं की जाँच और वर्षों से उठते भर्ती-संबंधी विवाद दर्ज हैं।
यही कारण है कि मेरा प्रश्न किसी दल से बड़ा है:
पच्चीस वर्षों में झारखंड ऐसा विश्वसनीय संस्थागत ढाँचा क्यों नहीं बना सका जिसमें भर्ती परीक्षा समय पर हो, नियम बीच में न बदलें, प्रश्नपत्र सुरक्षित रहें, परिणाम विश्वसनीय हों और अभ्यर्थी को बार-बार सड़क पर न उतरना पड़े?
सरकार के साथ विधानसभा भी जवाबदेह है
लोकतंत्र में हम अक्सर हर विफलता का दोष केवल सरकार पर डाल देते हैं। लेकिन संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था इससे कहीं अधिक व्यापक है।
कार्यपालिका सरकार चलाती है। प्रशासन संस्थाओं को संचालित करता है। लेकिन विधानसभा का काम केवल कानून पास करना नहीं है।
विधानसभा को सरकार पर निगरानी रखनी है।
विधायक प्रश्न पूछ सकते हैं। प्रश्नकाल का उपयोग कर सकते हैं। समितियों के माध्यम से जाँच और समीक्षा कर सकते हैं। बजट पर सवाल उठा सकते हैं। भर्ती संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर बहस करा सकते हैं। कानून बना सकते हैं। सरकार से समयबद्ध कार्रवाई की माँग कर सकते हैं।
इसलिए यदि वर्षों तक एक ही प्रकृति की संस्थागत समस्याएँ दोहराती रहें, तो जिम्मेदारी केवल मुख्यमंत्री या किसी आयोग के अध्यक्ष की नहीं रह जाती।
यह विधानसभा की सामूहिक जवाबदेही का प्रश्न भी बन जाता है।
सत्तापक्ष इसलिए जवाबदेह है क्योंकि वह सरकार चलाता है।
विपक्ष इसलिए जवाबदेह है क्योंकि उसका संवैधानिक काम सरकार को जवाबदेह रखना है।
और विधायक इसलिए जवाबदेह हैं क्योंकि उन्हें जनता ने पाँच वर्षों तक केवल अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने के लिए नहीं, बल्कि राज्य की शासन-व्यवस्था पर निगरानी रखने के लिए भेजा है।
दो अवसरों पर दिखाई देने वाली राजनीतिक एकता
यहाँ मैं अपने दो अनुभवों का उल्लेख करना चाहता हूँ।
एक बार मैंने झारखंड से संबंधित एक टेलीविजन चर्चा देखी। अलग-अलग बड़े राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि वहाँ उपस्थित थे। कई मुद्दों पर उनमें मतभेद हो सकते थे, लेकिन झारखंड की समस्याओं के कारणों की चर्चा में मुझे ऐसा लगा कि बड़ी आसानी से जिम्मेदारी झारखंड के लोगों और समाज पर डाल दी जा रही थी।
मुझे वह दृश्य असहज लगा।
दूसरा दृश्य विधानसभा से जुड़ा है।
2023 में झारखंड विधानसभा में दलगत सीमाओं के पार कई विधायकों ने अपने वेतन में वृद्धि की माँग उठाई। बाद में वेतन और विभिन्न भत्तों में बढ़ोतरी की प्रक्रिया आगे बढ़ी और जून 2024 में राज्य मंत्रिमंडल ने विधायकों के मूल वेतन को ₹40,000 से ₹60,000, क्षेत्रीय भत्ते को ₹65,000 से ₹80,000 और जलपान भत्ते को ₹30,000 से ₹40,000 मासिक करने को मंजूरी दी।
मेरा विरोध इस बात से नहीं है कि विधायक को अच्छा वेतन क्यों मिलता है।
जनप्रतिनिधि को सम्मानजनक वेतन मिलना ही चाहिए।
अन्यथा राजनीति केवल उन लोगों के लिए उपलब्ध हो जाएगी जिनके पास पहले से धन है।
प्रश्न दूसरा है:
विधायक के वेतन और सुविधा बढ़ने की प्रक्रिया क्या जनता की प्रगति से भी किसी प्रकार जुड़ी होनी चाहिए या नहीं?
झारखंड का आर्थिक विरोधाभास
झारखंड प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध राज्य है। राज्य सरकार स्वयं कोयला, लौह अयस्क, ताँबा, यूरेनियम, बॉक्साइट और अन्य खनिज संसाधनों की बड़ी उपलब्धता का उल्लेख करती है।
लेकिन नागरिक आय की तस्वीर बिल्कुल अलग है।
Reserve Bank of India द्वारा प्रकाशित, National Statistical Office के आँकड़ों पर आधारित 2024-25 के राज्यवार प्रति व्यक्ति Net State Domestic Product में झारखंड की प्रति व्यक्ति आय ₹1,16,663 वार्षिक थी। इसका साधारण मासिक समतुल्य लगभग ₹9,722 बैठता है। RBI की उसी तालिका में जिन राज्यों के 2024-25 के आँकड़े उपलब्ध हैं, उनमें बिहार और उत्तर प्रदेश ही झारखंड से नीचे हैं।
यहाँ एक सावधानी जरूरी है: प्रति व्यक्ति आय का अर्थ यह नहीं है कि हर झारखंडी के हाथ में ₹9,722 मासिक वेतन आता है। यह पूरे राज्य की औसत आर्थिक आय का सांख्यिकीय संकेतक है।
लेकिन इसी कारण यह लोकतांत्रिक तुलना महत्वपूर्ण भी है।
2024 के संशोधन के बाद विधायक का केवल मूल वेतन, क्षेत्रीय भत्ता और जलपान भत्ता मिलाकर ही ₹1.80 लाख प्रतिमाह होता है; इसके अतिरिक्त अन्य अनुमन्य सुविधाएँ और भत्ते अलग हो सकते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि विधायक को ₹9,722 मिलना चाहिए।
अर्थ केवल इतना है कि हमें एक लोकतांत्रिक प्रश्न पूछना चाहिए:
क्या प्रतिनिधि की आर्थिक प्रगति और जिस जनता का वह प्रतिनिधित्व करता है उसकी आर्थिक प्रगति के बीच कोई संबंध होना चाहिए?
मेरे अनुसार—हाँ।
इसीलिए मैंने अपनी पुस्तक में यह सुधार प्रस्तावित किया है
मेरी पुस्तक वैकल्पिक राजनीति के अध्याय 23 में पहला चुनावी एवं प्रतिनिधित्व सुधार है:
“प्रतिनिधि का वेतन जनता की आय और क्षेत्रीय प्रगति से जुड़े।”
लेकिन इस प्रस्ताव को गलत ढंग से नहीं समझना चाहिए।
मैं विधायकों का वेतन समाप्त करने या उन्हें आर्थिक रूप से असुरक्षित करने का प्रस्ताव नहीं कर रहा।
प्रस्ताव है:
सम्मानजनक आधार वेतन + जनता की प्रगति से जुड़ा जवाबदेही घटक।
अर्थात प्रतिनिधि को इतना निश्चित वेतन अवश्य मिले कि राजनीति केवल अमीर लोगों का पेशा न बन जाए। लेकिन वेतन और सुविधाओं में भविष्य की वृद्धि पूरी तरह प्रतिनिधियों के अपने निर्णय पर निर्भर न हो।
उसका एक भाग क्षेत्र की आर्थिक प्रगति, सार्वजनिक रिपोर्टिंग और नागरिक मूल्यांकन से जुड़े। यही पुस्तक के अध्याय 23 का मूल प्रस्ताव है।
ऐसा करने से क्या बदलेगा?
पहला—प्रतिनिधि और जनता के हित एक दिशा में आएँगे
आज ऐसी स्थिति संभव है कि किसी क्षेत्र की आय वर्षों तक ठहरी रहे, बेरोजगारी बढ़े, स्कूल और अस्पताल कमजोर रहें, भर्ती लटकी रहे—फिर भी प्रतिनिधि का वेतन और सुविधा नियमित रूप से बढ़ते रहें।
यानी जनता का परिणाम और प्रतिनिधि का परिणाम दो अलग-अलग दुनियाओं में चल सकते हैं।
आय-संबंधित व्यवस्था इस दूरी को कम करेगी।
दूसरा—राजनीतिक चर्चा घोषणाओं से परिणामों की ओर जाएगी
यदि वेतन-वृद्धि क्षेत्र की वास्तविक प्रगति पर निर्भर होगी, तो विधायक को पूछना पड़ेगा:
मेरे क्षेत्र की प्रति व्यक्ति आय कितनी बढ़ी?
स्थानीय रोजगार कितना बढ़ा?
बुनियादी सेवाएँ सुधरीं या नहीं?
सरकारी योजनाओं का वास्तविक परिणाम क्या हुआ?
नागरिकों की आय बढ़ी या केवल सरकारी खर्च?
राजनीति का केंद्र उद्घाटन से परिणाम की ओर जाएगा।
तीसरा—विधायक स्वयं संस्थागत सुधार में रुचि लेंगे
आज भर्ती आयोग विफल हो तो सबसे अधिक कीमत विद्यार्थी चुकाता है।
यदि सरकारी संस्थाओं के समग्र प्रदर्शन का एक हिस्सा जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही से भी जुड़ जाए, तो परीक्षा आयोग, स्कूल, अस्पताल, स्थानीय निकाय और प्रशासन की कार्यक्षमता विधायक के लिए केवल “सरकार का विषय” नहीं रहेगी।
चौथा—वेतन बढ़ाने का निर्णय स्वयं विधायक अकेले नहीं करेंगे
यह लोकतंत्र की एक अजीब स्थिति है कि जिन लोगों का वेतन बढ़ना है, वे स्वयं उस प्रक्रिया के राजनीतिक निर्णायक भी बन सकते हैं।
इसके स्थान पर एक स्वतंत्र जनप्रतिनिधि पारिश्रमिक आयोग होना चाहिए।
वह आर्थिक आँकड़ों, राज्य की वित्तीय स्थिति, नागरिक आय और प्रतिनिधियों के दायित्व को देखकर पारिश्रमिक तय करे।
पाँचवाँ—लोकतंत्र में मनोवैज्ञानिक दूरी घटेगी
लोकतंत्र केवल संविधान की संरचना नहीं है। यह नागरिक और प्रतिनिधि के बीच संबंध भी है।
यदि नागरिक लगातार आर्थिक असुरक्षा में रहे और प्रतिनिधि की जीवन-व्यवस्था उससे पूरी तरह कट जाए, तो धीरे-धीरे प्रतिनिधि स्वयं को नागरिक से ऊपर समझने लगता है।
यही वह स्थान है जहाँ लोकतंत्र का चरित्र बदलने लगता है।
प्रतिनिधि जनता का मालिक नहीं है।
वह जनता द्वारा दिया गया संवैधानिक दायित्व निभाने वाला व्यक्ति है।
इसे व्यवहार में कैसे लागू किया जा सकता है?
एक व्यावहारिक मॉडल बनाया जा सकता है।
पहला: विधायक का पर्याप्त और सम्मानजनक आधार वेतन निश्चित हो।
दूसरा: वेतन-भत्तों में अगली वृद्धि स्वतःस्फूर्त राजनीतिक निर्णय से न होकर स्वतंत्र आयोग की सिफारिश पर हो।
तीसरा: वृद्धि का प्रमुख आर्थिक आधार राज्य और निर्वाचन क्षेत्र की प्रति व्यक्ति आय की वास्तविक वृद्धि हो।
चौथा: क्योंकि आज विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र स्तर की प्रति व्यक्ति आय नियमित रूप से उपलब्ध नहीं होती, राज्य सांख्यिकी तंत्र को “Constituency Economic Accounts” विकसित करने चाहिए।
पाँचवाँ: केवल आय को आधार बनाना भी पर्याप्त नहीं होगा। आय के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सार्वजनिक सेवाओं और क्षेत्रीय विकास के कुछ सीमित, स्वतंत्र रूप से सत्यापित संकेतक जोड़े जा सकते हैं। इससे किसी एक आँकड़े को कृत्रिम रूप से बढ़ाने की प्रवृत्ति कम होगी।
छठा: विधायक की विधानसभा उपस्थिति, प्रश्न, समितियों में भागीदारी और जनता के सामने वार्षिक रिपोर्ट भी सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध हो।
सातवाँ: बाढ़, सूखा, महामारी या असाधारण आर्थिक संकट के लिए स्पष्ट अपवाद हों, ताकि प्रतिनिधि को उन परिस्थितियों के लिए दंडित न किया जाए जो उसके नियंत्रण से बाहर हैं।
अर्थात यह “सजा” की व्यवस्था नहीं होगी।
यह जवाबदेही की व्यवस्था होगी।
भर्ती संकट से इसका क्या संबंध है?
बहुत सीधा संबंध है।
आज विद्यार्थी सड़क पर इसलिए नहीं है कि केवल कोई एक परीक्षा गलत हो गई।
वह इसलिए सड़क पर है क्योंकि उसका संस्थाओं पर भरोसा टूट रहा है।
एक लोकतांत्रिक राज्य में किसी युवा को यह विश्वास होना चाहिए कि परीक्षा घोषित होगी तो समय पर होगी; नियम स्पष्ट होंगे; पेपर सुरक्षित रहेगा; मूल्यांकन निष्पक्ष होगा; परिणाम समय पर निकलेगा; शिकायत की स्वतंत्र व्यवस्था होगी; गलती साबित हो तो जिम्मेदार व्यक्ति पर कार्रवाई होगी।
यदि इसके लिए युवाओं को हर कुछ वर्षों में आंदोलन करना पड़े, तो समस्या अभ्यर्थियों की नहीं—संस्था की है।
और यदि संस्था पच्चीस वर्षों में भी विश्वसनीय नहीं बन पाई, तो प्रश्न केवल उस समय के आयोग-अध्यक्ष या मुख्यमंत्री का नहीं रह जाता।
प्रश्न पूरी राजनीतिक व्यवस्था और विधानसभा की सामूहिक जवाबदेही का बन जाता है।
सरकारें बदलें, संस्थाएँ मजबूत होती जाएँ
मैं वर्तमान सरकार की जवाबदेही कम करने की बात नहीं कर रहा।
जो आज सरकार में है, आज के निर्णयों की पहली जिम्मेदारी उसी की है।
लेकिन मैं विपक्ष को भी केवल दर्शक या अभियोजक मानने के लिए तैयार नहीं हूँ।
जिस पार्टी ने पहले शासन किया है, उसे अपने शासनकाल का हिसाब भी देना चाहिए।
और जो विधायक सदन में बैठता है, उसका प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए कि अगला चुनाव कौन जीतेगा।
उसका प्रश्न होना चाहिए:
झारखंड की संस्थाएँ हर सरकार के बाद पहले से मजबूत हुईं या नहीं?
यही लोकतंत्रीकरण है।
लोग आते-जाते रहेंगे।
सरकारें बदलती रहेंगी।
दल जीतेंगे और हारेंगे।
लेकिन JPSC, JSSC, स्कूल, अस्पताल, पुलिस, पंचायत, सूचना आयोग, लोकायुक्त, न्याय और प्रशासन जैसी संस्थाओं को हर कार्यकाल के बाद अधिक सक्षम, अधिक स्वतंत्र और अधिक जवाबदेह होना चाहिए।
यदि ऐसा नहीं होता तो चुनाव तो होते हैं, लोकतंत्र आगे नहीं बढ़ता।
सवाल वेतन का नहीं, लोकतांत्रिक संबंध का है
इसलिए मेरा प्रस्ताव किसी विधायक के खिलाफ नहीं है।
मैं यह भी नहीं कहता कि कम वेतन अपने-आप अच्छा विधायक पैदा कर देगा।
प्रश्न इससे कहीं बड़ा है।
क्या जनता की स्थिति से पूरी तरह असंबद्ध प्रतिनिधि-सुविधा लोकतांत्रिक रूप से उचित है?
मेरे अनुसार नहीं।
जिस दिन विधायक की आर्थिक प्रगति, राजनीतिक प्रतिष्ठा और सार्वजनिक मूल्यांकन उसके क्षेत्र के नागरिक की प्रगति से जुड़ने लगेंगे, उस दिन राजनीति की दिशा भी बदलने लगेगी।
तब विधायक केवल यह नहीं पूछेगा—
“मेरा अगला चुनाव कैसे जीता जाए?”
उसे यह भी पूछना पड़ेगा—
“मेरे क्षेत्र के नागरिक की आय कैसे बढ़े?”
“मेरे युवाओं को निष्पक्ष अवसर कैसे मिले?”
“हमारी भर्ती संस्था विश्वसनीय कैसे बने?”
“हमारे स्कूल और अस्पताल क्यों नहीं सुधर रहे?”
“और पाँच वर्ष बाद मैं जनता के सामने किस परिणाम के साथ खड़ा होऊँगा?”
लोकतंत्र में प्रतिनिधि का सुख जनता के दुख से पूरी तरह अलग नहीं होना चाहिए।
इसीलिए मैं मानता हूँ कि विधायक का वेतन उसकी जनता की आय और उसके क्षेत्र की प्रगति से जुड़ना चाहिए।
यह वेतन-विरोध नहीं है।
यह विधायक-विरोध भी नहीं है।
